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केवल माहवारी क्यों महिला प्रसाधन पर भी चर्चा जरूरी है
- By 24hnbc --
- Monday, 08 Jun, 2026
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बिलासपुर, 8 जून 2026।
9 जून को जागरूक नारी आर्यन फिल्म की ओर से प्रार्थना भवन बिलासपुर में जागरूक नारी शीर्षक से मासिक धर्म जागरूकता कार्यक्रम हो रहा है। परंपरा अनुसार कलेक्टर, एसपी, सीईओ, नगर निगम कमिश्नर मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि हैं शायद संभाग आयुक्त का समय नहीं मिल पाया होगा अन्यथा वे भी आ जाते हैं। कार्यक्रम का आमंत्रण पत्र बताता है कि शहर के टॉप 10 महिला चिकित्सक कार्यक्रम में उपस्थित रहेगी।
हमको यह आमंत्रण पत्र अपनी जागरूक महिला पत्रकार साथी की स्टेटस से प्राप्त हुआ। हम इस मुद्दे पर कुछ लिख रहे हैं और हमने अपने सम्माणीय पत्रकार साथी से उनके आमंत्रण पत्र पर लिखने की मौखिक इजाजत ली है। दो बातें 8 मार्च को महिला दिवस होता है और 28 मई को पीरियड दिवस। 28 मई को ही क्यों जवाब है कि मई वर्ष का पांचवा महीना है और पीरियड का चक्र 5 दिन का माना जाता है इसलिए 28 मई माहवारी दिवस मनाया जाता है।
अब मामला इससे आगे छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में महिला प्रसाधन ना होने की बड़ी समस्या है इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ के उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी चल रही है। राज्य में सरकारी स्कूलों की संख्या 66 से 68000 के मध्य है। 13639 प्राथमिक विद्यालयों में से 131 विद्यालयों में छात्रों के लिए शौचालय नहीं है। छत्तीसगढ़ में 5000 से अधिक सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है। हाई कोर्ट ने इस याचिका पर 23 मार्च 2026 को सुनवाई की थी जिसमें कहा गया था कि 5000 से अधिक विद्यालयों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है जबकि 8000 से अधिक विद्यालयों में शौचालय की स्थिति अत्यंत खराब है।
बिलासपुर जिले में 200 से अधिक स्कूलों में शौचालय अनउपयोगी है और 160 से अधिक स्कूलों में शौचालय की समस्या गंभीर है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शौचालय की समस्या का सीधा संबंध मूत्र संक्रमण से होता है। सरकारी स्कूलों में लगभग 19 लाख 54 हजार छात्राएं नामांकित हैं हम यहां पर अन्य राज्यों के शौचालय की स्थिति पर भी बात कर सकते हैं पर वह जरूरी नहीं है।
तीसरे नेत्र के लिए करोड़ों रुपए की फंडिंग निजी क्षेत्र कर देता है तो क्या उनके लिए कैमरा और शौचालय के बीच प्राथमिकता क्या है। 9 जून को जिले की बड़ी ब्यूरोक्रेसी और उच्च शिक्षित चिकित्सक और बहुत से प्रबुद्धजन पीरियड में चर्चा करने बैठेंगे तो स्कूलों में महिला प्रसाधन न होने पर भी चर्चा हो जाए और चर्चा की शुरुआत तो सरकारी दफ्तर के महिला प्रसाधन से शुरू हो जहां पर विशिष्टता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनमें ताला डाल कर रखा जाता है।
शहरी क्षेत्र में पिक टॉयलेट की अभी भी जबरदस्त कमी है स्थिति इतनी खराब है कि अभिजात वर्ग की कॉलोनीयों में भी घरों में काम करने वाली महिला कर्मचारियों को खुले प्लांट में प्रसाधन के लिए जाना होता है। भारत में पीरियड की बातें उच्च न्यायालय से निकलकर संसद तक जाती है सांसद अपनी भूमिका (कानून बनाने की) से जी चुराता है और मामला कोर्ट में जाता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां माहवारी में अपना टर्नओवर देखी है बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं जिसका कोई वैज्ञानिक सच नहीं पता अभी भी महावारी के दौरान मंदिर से लेकर रसोई तक कुछ परंपराएं हैं। कुछ वर्जनाए कुछ प्रगतिशीलता है पर यह सच है कि किसी भी धर्म में माहवारी को लेकर प्रगतिशील बात नहीं है।


