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पूछने वाला दिमाग नक्सली कांवरिया ढोने वाला राष्ट्र भक्त

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बिलासपुर, 16 अगस्त 2026। 
हमारा समाज बलात्कारी और अपराधिक सांसदों को अपने टैक्स की कमाई लूटने देता है पर हमें आंदोलन करने वाले संस्कारी बालक चाहिए। वैकेंसी निकल दो पर नहीं निकाल सकते क्योंकि प्रधान सेवक को लाभार्थी पसंद है उन्हें शोधार्थी नहीं चाहिए। शोधार्थी तो उनकी नजर में नक्सली है और अंतिम नेशनलिस्ट है। राष्ट्रीय प्रेम केवल आरएसएस, भाजपा का कॉपीराइट है बाकी कोई राष्ट्रभक्ति हो ही नहीं सकता। 15 अगस्त को लाल किले से प्रधान सेवक ने 73 मिनट का भाषण दिया 20 बार युवा/युवाओं 16 बार नौजवानों और छह बार नौजवान बोला पर परीक्षा और भर्ती विवाद पर कुछ नहीं कहा। फिर एक जुमला फेंका है एक करोड़ युवाओं को एआई सेक्टर में जांब देंगे यह योजना शानदार तरीके से 10372 करोड़ की है। अब हमारा नक्सली दिमाग कहता है कि जिस देश में 84 हजार स्कूल बंद हो जाए 15 मिलियन बच्चे का एनरोलमेंट खत्म हो जाए वहां पर एआई से एक करोड़ जॉब कैसे दिया जा सकता है। 2024 में आईटी सेक्टर से 60000 लोगों को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इंफोसिस ने 13655 को, विप्रो ने 9289, एचसीएल 5624, एलटी ने 1158 को नौकरी से निकला। 1 वर्ष के भीतर आईटी सेक्टर में 60000 लोगों की नौकरी निपट गई यह वह लोग थे जो आईटी सेक्टर के मास्टर थे तो सरकार यह दम कैसे कर सकती है कि एआई सेक्टर में एक करोड़ जॉब देगी। जिस योजना का यश गान प्राचीर से किया गया है उसका अकाउंट देखिए 4500 करोड़ की तो खरीदी की जाएगी मतलब 23000 करोड़ में से 4500 करोड़ तो सामान खरीदने में चला गया है तो ट्रेनिंग के लिए क्या बचा। असल में सरकार नहीं चाहती कि कोई सोचे समझे इसलिए एफसीआरए बिल लाया गया जो सोचते समझते हैं उन्हें नक्सली दिमाग कहा जाता है। देश की बड़ी रिसर्च कंपनी सीपीआर 1973 से कम कर रही थी 2022 में उनके यहां छापा मारा गया और इनका एफसीआरए निलंबित कर दिया गया। और 2024 में एफसीआरए बंद कर दिया गया। एम्बेसटी इंटरनेशनल ग्रीनपीस अक्सपेन इंडिया इंडिया इंडिपेंडेंस मीडिया जैसों के फंड को खत्म करने ही एफसीआरए को आया गया। बेरोजगारी की हकीकत यह है कि भारत के कुल बेरोजगारों में 83% युवा है। 20 से 30 आयु वर्ग के युवा बेरोजगार 36% है। सरकार की पीएमकेवाई योजना फ्लॉप रही है केवल 20% को प्लेसमेंट दे पाई यही हाल पीएम स्किल सेंटर का है बड़ी संख्या में ऐसे स्किल सेंटर कागजों पर मात्र हैं। असल में सरकार जांब क्राइसिस को मैनेज नहीं कर रही है डाटा मैनेज कर रही है और डाटा जो खोजना है उसे नक्सली रहती है क्योंकि बंदूक लेकर जंगल में घूमने वाला नक्सली उतना खतरनाक नहीं है जितना की डाटा की सच्चाई जानने वाला है। यही कारण है कि सरकार को कांवरिया अच्छा लगता है और पूछने वाला युवा नक्सली लगता।