No icon

24hnbc

तंबाकू का हर विकल्प हानिप्रद ही है.....डॉक्टर पुष्कल

24hnbc.com
बिलासपुर, 31 मई 2026
हड्डी टूटने पर दर्द दिखता है, एक्स-रे में फ्रैक्चर दिख जाता है और इलाज शुरू हो जाता है। लेकिन कुछ फ्रैक्चर ऐसे होते हैं जो दिखाई नहीं देते। तंबाकू उन्हीं में से एक है—एक Silent Fracture जो धीरे-धीरे शरीर, परिवार और समाज को भीतर से कमजोर करता रहता है।
छत्तीसगढ़ में तंबाकू सेवन की दर लगभग 39.1% बताई गई है, जो राष्ट्रीय औसत 28.4% से काफी अधिक है। गुटखे के बाद गुड़ाखू दूसरा सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला तंबाकू उत्पाद बनकर उभरा है। विशेष चिंता की बात यह है कि इसका उपयोग महिलाओं और 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिक पाया गया है।
सर्वेक्षणों के अनुसार:
• 52% लोगों ने किशोरावस्था में तंबाकू सेवन शुरू किया।
• 84% लोगों ने कभी छोड़ने का प्रयास नहीं किया।
• छोड़ने का प्रयास करने वालों में से आधे से अधिक एक महीने के भीतर पुनः सेवन करने लगे।
 
कई लोग गुड़ाखू को दांत साफ करने की पारंपरिक आदत मानते हैं, जबकि यह मुंह, गले और भोजन नली के कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकता है।
 इन लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें:
• मुंह में न भरने वाला घाव
• सफेद या लाल धब्बे
• मुंह खुलने में कठिनाई
• निगलने में परेशानी
• गर्दन में गांठ
साथ ही यह समझना भी आवश्यक है कि फेफड़ों का कैंसर केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं है। आज भारत और एशिया में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज मिल रहे हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया, फिर भी उन्हें फेफड़ों का कैंसर हुआ है।
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
✔ EGFR, ALK, ROS1, RET, MET जैसे जीन परिवर्तनों से कैंसर विकसित होना
✔ वायु प्रदूषण (PM2.5)
✔ बायोमास ईंधन का धुआँ
✔ परोक्ष धूम्रपान
✔ औद्योगिक प्रदूषक एवं अन्य पर्यावरणीय जोखिम
इसलिए कैंसर की रोकथाम केवल तंबाकू छोड़ने तक सीमित नहीं है। स्वच्छ वायु, जागरूकता, समय पर जांच, आधुनिक Molecular Testing और बेहतर उपचार सुविधाएं भी उतनी ही आवश्यक हैं।
तंबाकू का कोई भी रूप सुरक्षित नहीं है।
गुटखा, गुड़ाखू, बीड़ी, सिगरेट, खैनी या जर्दा—हर रूप कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाता है।
आज तंबाकू छोड़ना केवल एक आदत छोड़ना नहीं, बल्कि अपने परिवार, अपने स्वास्थ्य और अपने भविष्य की रक्षा करना है।