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बाल्यकाल में ही खेमे बाजी का शिकार है, छत्तीसगढ़ का फिल्म उद्योग

बिलासपुर 24 hnbc. 

 

छत्तीसगढ़ में फिल्म उद्योग अभी बाल्यकाल में हैं फिर भी यहां खेमे बाजी ने अपनी जड़े जमा ली हैं। ऐसा बताया जाता है कि खेमे बाजी कई तरीके की हैं। पहला खेमा शहर के आधार पर है दूसरा खेमा प्रोड्यूसर के आधार पर खेमे बाजी और तीसरा जाति बिरादरी के आधार पर खेमे बाजी इस बीच में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पैसा लगाकर वक्त के आधार पर कलाकारों, तकनीसीयनस से काम लेते हैं इसे व्यवहारवाद कहा जा सकता है। कोविड काल में भी छत्तीसगढ़ी फिल्मों का काम चल रहा था और उस समय भी कुछ अच्छे काम दिखाई दिए अभी थ्रीयेटर खुलने के बाद एक ही दिन में दो फिल्में रिलीज हुई हैं जबकि माना जाता है कि छत्तीसगढ़ में दो शहर बिलासपुर रायपुर पिक्चरों के प्रदर्शन के लिए इतना ही स्थान रखते हैं कि 1 दिन में एक पिक्चर ही रिलीज हो एक साथ 2 फिल्म रिलीज होने से ही व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते एक फिल्म का कितना तय माना जाता है अब बात की जाए खेमे बाजी की छत्तीसगढ़ी फिल्मों में प्रोड्यूसर ही सब कुछ होता है । इसलिए पहला खेमा प्रोड्यूसर का ही है प्रोड्यूसर कलाकार हो या नहीं वह सबसे पहले अपना रोल निश्चित करता है साथ ही अपनी एक टीम बना लेता है और टीम के साथ कंपनी टाइप काम करता है एक टीम के सदस्य को दूसरे टीम में काम नहीं मिलता है जिसका सीधा अर्थ टैलेंट पर पड़ता है काम हो या ना हो जिस कंपनी को ज्वाइन कर लिया है उससे बाहर जाने का सवाल नहीं उठता अब दूसरी खेमे बाजी शहर की आती है हर शहर का अपना एक फिल्म उद्योग है रायपुर के कलाकार को बिलासपुर में और बिलासपुर के कलाकार को रायपुर में काम के लिए ना सुने ना पड़ता है तीसरा खेमा ऐसे व्यापारी वर्ग का है जिसने अपनी निजी महत्वाकांक्षा के चलते इस क्षेत्र को चुना है। वह व्यवहारवाद का समीकरण अपनाते हैं और अपने काम का लाभ निकालने के लिए ऐसे कलाकारों का चयन कर रहे हैं जो खेमे बाजी में ना फंसे हो अभी-अभी एक तीसरी बिरादरी भी सक्रिय हो गई है और यहां भी आरक्षण जैसा फार्मूला लग गया है और यह वर्ग है जाति विशेष पर फिल्म बनाने वालों का ऐसे लोगों ने एक जाति वर्ग विशेष के बीच सब कुछ ढूंढने का फैसला किया है पैसा, तकनीक, कलाकार, लेखक, कैमरामैन, लाइटमैन सब कुछ एक ही वर्ग के बीच से चुने जा रहे हैं । इन सब चीजों का प्रभाव छालीवुड के ग्रोथ पर पड़ रहा है इसे स्वतंत्र बाजार के साथ बढ़ने वाला उद्योग नहीं कहा जा सकता हालांकि खेमे बाजी से कुछ कलाकार इनकार भी करते है लेकिन यह माना जा सकता है कि काम के सीमित अवसर के बीच खेमे बाजी को हांं करना अपने को नुकसान पहुंचाना है ।