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एक ही दस्तावेज में दोनों की भूमिका का दावा, जांच की निष्पक्षता पर शिकायतकर्ता ने उठाई आपत्ति

युक्तियुक्तकरण जांच में टांडे दोषी, सुनील यादव की भूमिका पर उठे सवाल

24hnbc.com
बिलासपुर, 5 सितंबर 2026। 
 शिक्षा विभाग के युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति विवाद की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अब पूरा मामला सिर्फ पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रह गया है। जांच समिति ने जहां तत्कालीन डीईओ विजय टांडे की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं, वहीं स्थापना शाखा के प्रभारी क्लर्क सुनील यादव भी कार्रवाई के घेरे में है।शिकायतकर्ता ने जांच की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस दस्तावेजी आधार पर जांच समिति ने टांडे को दोषी माना, उसी दस्तावेज में सुनील यादव की भूमिका होने के दावे के बावजूद उन्हें जांच के दायरे से बाहर करने की कोशिश क्यों हो रही है ?
जिस दस्तावेज पर टांडे दोषी, उसी में सुनील की भूमिका का दावा
शिकायतकर्ता अंकित गौरहा का कहना है कि वर्तमान जांच के दौरान उन्होंने जांच समिति को अपने पास मौजूद पूरे दस्तावेज और तथ्य उपलब्ध कराए थे। उनका दावा है कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर जांच समिति ने तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे को दोषी माना। लेकिन गौरहा का आरोप है कि उसी दस्तावेजी रिकॉर्ड में स्थापना शाखा के प्रभारी क्लर्क सुनील यादव की भूमिका भी सीधे सामने आती है।
गौरहा के मुताबिक उन्होंने जांच समिति से स्पष्ट रूप से मांग की थी कि दस्तावेजों में सामने आ रही सुनील यादव की भूमिका की भी जांच की जाए। इसके बावजूद जांच समिति ने द्वारा सुनील यादव को बचाया जा रहा हैं। अब यही बिंदु पूरी जांच प्रक्रिया पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
गौरहा का कहना है कि “जब मैंने जांच समिति को पूरे दस्तावेज दिए थे और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर टांडे दोषी पाए गए, तो उसी रिकॉर्ड में सामने आ रही सुनील यादव की भूमिका की जांच क्यों नहीं की गई? शिकायतकर्ता की मांग के बावजूद उन्हें क्यों बचाया जा रहा हैं।
हर जांच में अधिकारी निपटे, स्थापना शाखा का बाबू संदेह के घेरे मे शिकायतकर्ता का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी जांच में अधिकारी जिम्मेदार ठहराया गया और सुनील यादव बच निकले। करीब तीन साल पहले तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी एमएल पटेल के कार्यकाल में भी एक मामले की जांच हुई थी। शिकायतकर्ता के मुताबिक उस जांच में सुनील यादव की भूमिका दोषपूर्ण पाई गई थी और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई, यहां तक कि निलंबन की सिफारिश भी की गई थी।
लेकिन इसी मामले में तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी एमएल पटेल को निलंबित कर दिया गया, जबकि सुनील यादव पर कार्रवाई नहीं हुई। यही पुराना घटनाक्रम अब मौजूदा जांच में फिर सवालों के घेरे में है।
गौरहा का कहना है कि “हर बार जांच की आंच अधिकारी तक पहुंचती है, लेकिन स्थापना शाखा में बैठा बाबू बच जाता है।” उनका कहना है कि यही स्थिति अब युक्तियुक्तकरण प्रकरण में भी दिखाई दे रही है। विजय टांडे को दोषी माना गया, लेकिन सुनील यादव को हर बार बचाने की कोशिश की गई।
मंत्री से करीबी संबंध की चर्चा,रसूख पर उठे सवाल सुनील यादव के शिक्षा मंत्री से करीबी संबंध होने की चर्चा भी इस पूरे मामले में लगातार सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक सुनील यादव की सत्ता के शीर्ष स्तर तक गहरी पहुंच बताई जाती है। हालांकि इस राजनीतिक जुड़ाव और किसी कार्रवाई को प्रभावित करने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी प्रभाव के कारण सुनील यादव लगातार कार्रवाई से बचते रहे हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यही रसूख वर्तमान जांच में फिर बचने के पीछे भी एक कारण है ? यदि ऐसा नहीं है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में सुनील यादव की भूमिका की जांच क्यों नहीं की गई।
डेढ़ से दो सौ शिकायतों का दावा, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?
अंकित गौरहा का दावा है कि सुनील यादव के खिलाफ करीब 150 से 200 शिकायतें विभिन्न स्तरों पर की जा चुकी हैं। इनमें प्रतिनियुक्ति, ट्रांसफर-पोस्टिंग और वर्तमान में चल रहे विकल्प से जुड़े मामलों में भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतें कमिश्नर,सचिव, कलेक्टर और मंत्री स्तर तक पहुंचने का दावा भी किया गया है।
उनका कहना है कि यदि इतनी बड़ी संख्या में शिकायतें अलग-अलग स्तरों तक पहुंचीं तो प्रत्येक शिकायत में आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए थी। सवाल यही है कि जांच की आंच बार-बार अधिकारियों तक पहुंचती है, लेकिन सुनील यादव पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
कलेक्टर के जांच आदेश के बाद भी उठे सवाल शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि हाल ही में कलेक्टर ने सुनील यादव के खिलाफ जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी उन्होंने अपने स्थान पर एक चपरासी को बैठाकर स्थापना शाखा का काम करवाया। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। यदि यह तथ्य सही है तो यह भी जांच का विषय है कि किसी कर्मचारी को अपनी जगह दूसरे कर्मचारी से शाखा का काम कराने की अनुमति किस स्तर से मिली।
उनका कहना है कि उन्होंने जांच समिति को पूरे तथ्य और दस्तावेज दिए थे। उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर टांडे को दोषी पाया गया, लेकिन जिन दस्तावेजों में सुनील यादव की भूमिका होने का उनका दावा है,उन पर जांच समिति ने कोई ठोस निष्कर्ष नहीं दिया है।