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छत्तीसगढ़ का सुआ नृत्य: तोते के बहाने शिव-पार्वती से जुड़ी आस्था का प्रतीक, क्यों है प्रदेश की पहचान
- By 24hnbc --
- Tuesday, 03 Nov, 2026
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बिलासपुर/रायपुर, 4 नवंबर 2026।
छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ धान के कटोरे से नहीं, उसकी लोक संस्कृति से भी है। और उस लोक संस्कृति का सबसे पवित्र और भावनात्मक स्वरूप है - **सुआ नृत्य**। दीवाली के आसपास जब गांव-गांव में महिलाएं टोकरी में मिट्टी के तोतों की जोड़ी लेकर नाचती-गाती हैं, तो यह सिर्फ नृत्य नहीं, सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत प्रमाण होता है।
क्या है सुआ नृत्य?
छत्तीसगढ़ी में तोता को 'सुआ' कहा जाता है। इसी पक्षी के नाम पर इस नृत्य का नाम सुआ नृत्य पड़ा है।
यह मूल रूप से गोंड आदिवासी समाज की महिलाओं का नृत्य-गीत है, लेकिन आज सभी वर्ग की महिलाएं इसमें शामिल होती हैं। इसमें किसी ढोल-मांदल या बड़े मंच की जरूरत नहीं होती। महिलाएं घेरा बनाकर, बीच में धान से भरी टोकरी और उसमें रखे मिट्टी के दो सुआ (तोते) के साथ नृत्य करती हैं।
लोक मान्यता है कि टोकरी में विराजित सुआ की यह जोड़ी शंकर और पार्वती के प्रतीक होते हैं। कब और क्यों किया जाता है?
सुआ नृत्य की शुरुआत आमतौर पर दशहरे या शरद पूर्णिमा के बाद, और विशेष रूप से धनतेरस से लेकर दीपावली तक होती है।
इसके दो बड़े कारण हैं गौरा-गौरी विवाह से जुड़ाव: यह गौरा पर्व का एक मुख्य अंग है। गौरा का अर्थ है गौरी-पार्वती और गौरा का विवाह। गोंड समाज में शिव-पार्वती के विवाह को मानवीकरण कर हर साल गौरा-गौरी पर्व के रूप में मनाया जाता है। सुआ नृत्य उसी उत्सव की तैयारी है। प्राचीन मान्यता है कि महिलाएं गांव के घर-घर जाकर सुआ नाचती थीं और मिले पैसे-अनाज से गौरा-गौरी के विवाह का आयोजन करती थीं।
फसल उत्सव: यह समय धान की फसल के खलिहान में आ जाने का होता है, जब कृषि प्रधान प्रदेश को थोड़ा विश्राम मिलता है। इसलिए इसे समृद्धि और आभार का नृत्य भी कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ के लिए मुख्य क्यों है?
सुआ नृत्य को छत्तीसगढ़ की संस्कृति का दर्पण इसलिए कहा जाता है क्योंकि:
नारी जीवन का दर्शन: सुआ गीत छत्तीसगढ़ की नारियों का जीवन दर्शन है। इसमें 'तिरिया जनम झन दे, ना रे सुवना' जैसे गीतों के माध्यम से महिलाओं के मन के सुख-दुख, वेदना, अनुराग और अंतर्व्यथा की अभिव्यक्ति होती है। आदिकाल से सुआ को संदेश वाहक के रूप में जाना जाता है, तो महिलाएं तोते के माध्यम से अपना संदेश ससुराल, मायके तक पहुंचाती हैं।
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा: यह लिखित नहीं, मौखिक परंपरा है। दादी-नानी से बेटियों और पोतियों तक यह लोकगीत और नृत्य के रूप में आगे बढ़ रहा है।
बिना आडंबर के आस्था: वनवासी बहुल इस अंचल में अपने आराध्य भोलेनाथ की अर्चना में अंगीकृत सुआ नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यह धर्म, कृषि और लोकजीवन को एक साथ जोड़ता है।
इसीलिए सुआ नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की आस्था और विश्वास का प्रतीक है। जब तक छत्तीसगढ़ में धान की बालियां और गौरा-गौरी की पूजा है, तब तक सुआ की गूंज बनी रहेगी।

