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बलात्कार के संबंध में उच्च न्यायालय का फैसला डालता है समाज पर गहरा प्रभाव

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बिलासपुर, 19 फरवरी 2026। 
अपराध करने का तरीका कहां से सीखा कई बार इस प्रश्न का उत्तर मिलता है यूट्यूब से एक और उत्तर भी आम प्रचलित है जेल में था तब सीखा, एक तीसरा उत्तर भी है जो बेहद जटिल है अपराध करके बचाना कैसे हैं इससे अपराध करने का हौसला मिलता है और देश की बड़ी अदालतें जैसे उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय बलात्कार के अपराध पर जो निर्णय देती है उसमें अपराध से बचने के तरीके मिलते हैं और फिर अपराध करने का हौसला भी मिलता है। एक तरफ देश के उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक फैसला पलटा कहा निजी अंग को पकड़ना और पजामे का नाडा खींचना बलात्कार का प्रयास है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि "निजी अंग को पकड़ना और पजामे का नाडा खींचना बलात्कार करने की केवल तैयारी है"
 पहले समझे मामला था क्या महिला ने बताया था कि 10 नवंबर 2021 शाम 5:00 बजे शिकायतकर्ता महिला अपनी 14 वर्षीय बेटी के साथ अपने ननद के घर से लौट रही थी तभी उसके गांव के रहने वाले पवन, आकाश और अशोक रास्ते में मिले और पूछा कहां से आ रही हो तो उन्होंने उस बेटी को मोटरसाइकिल से घर छोड़ने की बात कही महिला ने इजाजत दे दी। आरोपियों ने रास्ते में ही मोटरसाइकिल रोक दी उसके निजी अंगों को पकड़ा और पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश की पजामे का नाडा खींचा लड़की की चीख पुकार सुनकर दो व्यक्ति वहां पहुंचे आरोपी भाग गए। अब चर्चा छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एक फैसले की यहां रेप के एक मामले को बलात्कार की कोशिश में बदलते हुए एक दोषी व्यक्ति की 7 साल की सजा घटाकर 3 साल कर दी। 16 फरवरी, 22 साल पुराने मामले में अपील डिसाइड करते हुए न्यायालय ने कहा पुरुष के लिंग को महिला के वेजिना के ऊपर रखना और फिर बगैर प्रवेश (पेनिट्रेशन) के सीमन गिरना (इक्यूलेट) करना रेप नहीं है। आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार नहीं कहा जा सकता यह रेप की कोशिश है। धारा 376/ 511 के तहत सजा सुनाई जानी चाहिए। जस्टिस ने कहा आरोपी की नियत आपराधिक और स्पष्ट थी लेकिन पेनिट्रेशन के ठोस प्रमाण न होने से यह अपराध 376 के बजाय 376 /511 के अंतर्गत आएगा। 
मामला 22 साल पुराना है 2004 में धमतरी जिले में एक युवती के साथ बलात्कार हुआ और 2005 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार का दोषी मानते हुए 7 साल की सजा दी। अभियोजन ने बताया कि महिला को उसके घर से आरोपी जबरन खींच कर महिला को अपने घर ले गया। वहां कपड़े उतार कर उसकी इच्छा के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की थी। पीड़िता को कमरे में बंद कर हाथ पैर बांध दिए गए मुंह में कपड़ा ठूस दिया गया था। बाद में उसकी मां ने उन्हें छोड़वाया था।
प्रारंभिक बयान में पेनिट्रेशन का आरोप था लेकिन बाद में पीड़िता ने स्वीकार किया कि आरोपी ने केवल उसके प्राइवेट पार्ट उसके वेजिना पर रखा था उसके प्राइवेट पार्ट और कपड़े पर स्पर्म मिलने की पुष्टि हुई थी डॉक्टरी रिपोर्ट में हाइमन सुरक्षित पाया गया। त्रिकोण ने कहा था कि यह तथ्य अपराध की कोशिश दर्शाते हैं अब उच्चतम न्यायालय के एक फैसला में कही गई बात को गौर करें। महिलाओं से जुड़े यौन अपराधों में अदालतों की और संवेदनशील टिप्पणियां पूरे समाज पर परिवार पर डर पैदा करने वाला असर डाल सकती है। स्क्रीन टू स्किन को यौन उत्पीड़न नहीं माने जाने की बात कही गई थी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला 7 साल की सजा को 3 साल कर दिया ऐसे बलात्कारियों को जो महिलाओं को षडयंत्र पूर्वक बेइज्जत करते हैं रास्ता बताता है कि उन्हें क्या नहीं करना है। किसी महिला के कपड़े फाड़ देना, हाथ पांव बांध देना, अपना स्पर्म उसके शरीर के अंगों पर गिरा देना और पेनिस को वेजिना में इंसर्ट नहीं करना यह किसी भी स्थिति में बलात्कार से कम पीड़ा दायक नहीं है क्योंकि बलात्कार केवल शरीर के साथ नहीं स्त्री के पूरे स्वाभिमान पर होता है और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्णय ने यह दिखा दिया कि किसी महिला की सर्वाधिक बेज्जती करके भी केवल 3 साल की सजा होगी। 
अब इसे राम रहीम, आसाराम बापू और गुजरात के उन सामूहिक बलात्कार के आरोपियों को याद करते हुए देखें जहां किसी की सजा कम कर दी गई, खत्म कर दी गई, बार-बार फेरोल मिलना फूल माला से स्वागत होना क्या इस सब से साधारण मस्तिष्क पर असर नहीं होता और कहीं फैसले प्रभावित तो नहीं होने लगे।