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गुरु घसीदास यूनिवर्सिटी के संदर्भ में

कबीर का दोहा निंदक नियरे राखिए भक्ति काल में बेईमानी है

24hnbc.com 
बिलासपुर, 15 जनवरी 2026।
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा साहित्यकार, कथाकार मनोज रूपडा के सात अपमान का मामला व्यवस्था के गल जाने का प्रभाव है। साहित्य समाज का दर्पण है कहा जाता है। विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालयों में जो चल रहा है वह भी तो दर्पण है। भक्ति काल के कवि कबीर दास महान संत थे उसे समय ही कह गए निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छबाये बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय। वे भक्ति काल थे आज भक्त काल है। वह भी अंधभक्त काल जाने पति शब्द लगते ही अकल सिर चढ़कर बोलता है फिर प्रोफेसर चक्रवाल तो कुल के पति है।
वाणिज्य क्षेत्र में विशेषज्ञ हैं शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव शायद उनके विवेक को हार गया है तभी तो उन्हें कबीर का दोहा स्मरण नहीं रहा अन्यथा जिस संस्कृति के वे छद्म ध्वजा वाहक बनकर वे पद सुशोभित है। याद रखते हैं एक समय था जब आलोचना, समालोचना, समीक्षा करने वाले को मान दिया जाता था और इस दोहे को याद रखा जाता था। मीडिया भी इसलिए मन पता था कि वह व्यवस्था को उसकी असलियत बताता था पर धीरे-धीरे भक्त कल आया और इस दोहे का महत्व ही खत्म हो गया है अब तो पत्तलकार, चाटुकार, चमचे और अंत में नाम मिला गोदी, गोद में बैठकर लल्लू चप्पू करने वाला और उन पर भौंकने वाला जो सत्ता को अपना दिखाएं वह स्थिति टॉप टू बॉटम है। मेडिकल कॉलेज को बंद कर देना यश माना जाता है व्यापारी को पृथक शिक्षा बोर्ड खुलवा देना शिक्षा क्रांति माना जाता है इस सोच का प्रभाव नहीं व्यवसाय कहा जाता है। बिलासपुर की घटना के बाद छोटे-मोटे विरोध प्रदर्शन के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ सब जानते हैं जो बोलेंगे उन सब का मानदेय बंद हो जाएगा। वैसे भी मंच पर स्थानीय साहित्यकारों को सरसों और सरसों ही मिलता है स्वर्ण तो कुमार के मुट्ठी में जाता है।