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जल, जंगल, जमीन छीनेन वाले को कैसे कहें सुशासन

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बिलासपुर, 4 दिसंबर 2025।
सरकार हाल ही में दावा करके हटी है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का सफाया, सरगुजा जिले के अमेरा ओपन कास्ट कोल माइंस विस्तार का विरोध ग्रामीणों ने इतनी जबरदस्त तरीके से किया कि पुलिस ग्रामीण झड़प में 25 पुलिसकर्मी घायल हुए। एक तरफ हथियारबंद नक्सली का सफाया और दूसरी और ग्रामीणों ने अपनी जमीन बचाने गुलेल हाथ में उठाया लिया अब सरकार समर्पण नीति में गुलेल जमा करने की कीमत क्या देगी।
सरकार लोकतंत्र के प्रति जवाब दे न होकर क्रॉनिक पूंजीवाद के प्रति समर्पित है। आदिवासी का, ग्रामीण का जल, जंगल, जमीन छीन कर निजी क्षेत्र में दिया जा रहा है। ऐसे में वह जिसका जीवन जल, जंगल, जमीन ही है। उसके पास गुलेल, तीर कमान, पत्थर, हसिया, टांगिया, भाला उठाने के अलावा विकल्प क्या है। पत्थर पकाने कोई पाकिस्तान से नहीं आएगा जब अस्तित्व की बात आ जाएगी तो अपने हित की रक्षा के लिए जो चीज सामने पड़ी होती है वही हथियार बन जाती है।
₹1000 लाडली बहन, लाडला भाऊ और ₹10000 उद्योग के लिए देकर सरकार किसी का जीवन नहीं छीन सकती, स्वास्थ्य, खाद्य, शिक्षा यह देना एक समय सरकार का काम था। आज सरकार इन्हें देने से पीछे हट रही है और जनता का जल, जंगल, जमीन ले लेना चाहती है। इस समाजवादी लोक कल्याणकारी सरकार तो नहीं कहा जा सकता।