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भाजपा की राजनीति अर्थशास्त्र, सर्वहारा वर्ग की मुसीबत

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बिलासपुर, 19 फरवरी 2024।
देश के संविधान के प्रस्तावना में समाजवादी अर्थव्यवस्था की बात है। पर इस दशक में देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था पर क्रोनिक पूंजीवाद का कब्ज केंद्र में ताबीज सत्ता ने कर दिया। देश प्रेम, उग्र राष्ट्रवाद में तब्दील हो गया हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने एलेक्ट्रोलर बॉन्ड को असंवैधानिक घोषित किया। साथी कंपनी अधिनियम 182 (1) 182 (3) वित्तीय अधिनियम 2017 के संशोधनों को असंवैधानिक करार दिया है। केंद्र में 2017 में जो बिल पास किया उसके कारण राजनीतिक दलों को 16000 करोड़ का चंदा मिल गया। इस चंदे का 90% हिस्सा भारतीय जनता पार्टी के खाते में गया बताया जाता है। देश में सार्वजनिक बैंकों की हालत खराब है और देश में ही एक राजनीतिक दल की तिजोरी कंपनियां भर रही है इस बात का सबूत 2014 में बैंक का एनपीए 8 लाख करोड़ था। 2020-21 में यह एनपीए 55 लाख करोड़ यह चार गुना से अधिक है। एलेक्ट्रोलर बान्ड में 2017 के बाद 16518 करोड रुपए आया प्रतिवर्ष 2753 करोड रुपए कंपनियों के पास देश के बैंकों का कर्ज पटाने धन नहीं है। तभी तो एनपीए 8 लाख करोड़ से 55 लाख करोड़ हो गया। इसी कॉरपोरेट फंडिंग के कारण देश में चुनाव अत्यधिक खर्चीले हो गए। 2009 में संसदीय चुनाव में 3 अरब डालर खर्च हुआ बताया जाता है जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में 2.4 अरब डालर खर्च हुआ । 2014 का चुनाव 30000 करोड़ में लड़ा गया वहीं 2018 के चुनाव में मात्र 75 दिन 60000 करोड़ खर्च हुआ एक वोट पर 700 रुपए और 1 लोकसभा क्षेत्र में 100 करोड़ देश के अर्थशास्त्र की बात नहीं है यह भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक अर्थशास्त्र है। देश तो आर्थिक सामाजिक न्याय की तलाश में भटक रहा है।