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फादर स्टेन स्वामी की मौत के 5 साल बाद भी हमने कुछ नहीं सीखा

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बिलासपुर, 7 जुलाई 2026।
भीमा कोरेगांव मामले पर बिलासपुर से क्यों लिखा जाए इस प्रश्न के दो जवाब हैं पहले यह मानव अधिकार हनन का मामला है और दूसरा इस प्रकरण में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में वकालत कर रही सुधा भारद्वाज को लंबे अरसे तक जेल में रहना पड़ा। फादर स्टेन स्वामी भीमा कोरेगांव मामले में कस्टडी के दौरान मौत को 5 साल हो चुका पर ऐसे मामलों में सरकारी कार्य प्रणाली में वे सुधार नहीं हुए जो हो जाने चाहिए। एनआईए ने इस मामले में बढ़ा चढ़ा कर आरोप लगाए पर सुनवाई में तेजी नहीं दिखाई दी। बहुत धीमी गति से चल रही सुनवाई और फादर स्टेन की मौत के बाद भी इसमें ज्यादा प्रगति नहीं हुई। उन्हें गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम यूएपीए के तहत आरोपों का सामना करते हुए 270 दिन से ज्यादा जेल में बिताए। उनकी उम्र बहुत ज्यादा थी। जमानत की अर्जियां बार-बार अदालतों ने खारिज की जबकि वे पार्किनसन्स और बुढ़ापे की बहुत सी बीमारियों से जूझ रहे थे। अदालती मामलों में वे इतने प्रताड़ित हुए कि उन्हें पानी पीने के लिए एक्स्ट्रा तक नहीं मिली। वे अपनी मौत को पहचान चुके थे और अपनों के बीच मरना चाहते थे पर अदालत को यह भी स्वीकार नहीं हुआ। उनकी अपील खारिज कर दी गई और उन्हें अस्पताल भेज दिया गया। 5 जुलाई को उनके अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि फादर स्टेन स्वामी इस सुबह अस्पताल में गुजर गए। मामले की सुनवाई कर रहे बेंच की पीठासीन जज जस्टिस एस एस शिंदे ने अंतिम संस्कार की तस्वीरें देखने के दो सप्ताह बाद कहा वे पादरी के काम का बहुत सम्मान करते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी फादर स्टेन की मौत पर शोक व्यक्त किया और कहा लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने कार्य किया। और भारत के सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की अपील की। 
2021 की कोविड महामारी की चरम पर एनआईए ने मेडिकल आधार पर 84 वर्षीय स्टेन स्वामी की जमानत याचिका का विरोध किया कहा वे हालात का नाजायज फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। समय के साथ इस मामले में बाकी सभी आरोपियों को अलग-अलग चरणों में जमानत या अंतरिम जमानत मिल गई। हमारे सामने यूएपीए में बंद जीएन साइन बाबा का मामला भी है। यूएपीए के तहत लगे सभी आरोपों से उन्हें बरी किया गया तब तक वे जेल में व्हीलचेयर पर 10 साल बिता चुके थे उनकी सेहत पर इतना विपरीत असर पड़ा की रिहाई के 6 महीने के भीतर उनकी मौत हो गई। मामले यहीं खत्म नहीं होते दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में भी अन्यायपूर्ण स्थिति बनी हुई है।सीएए विरोधी प्रदर्शनों में आगे रहने वाले कई एक्टिविस्ट को यूएपीए के तहत अंदर डाला गया है। ट्रायल लंबा चलेगा पर जमानत नहीं मिल रही। आखिर हम अपनी प्रक्रिया में आवश्यक सुधार कब करेंगे की मानव अधिकारों के लिए शासन, सट्टा जिन्हें षड्यंत्र के साथ अंदर कर देती है उन्हें कम से कम समय पर जमानत तो मिल जाए।