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प्रतिभा अभिव्यक्ति हो गई महंगी, संस्कार नहीं जहर घोल रहे हैं "निजी स्कूल"

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बिलासपुर, 14 अगस्त 2023।
 
कोविड के टाइम पर दाने-दाने के लिए मोहताज होने वाले निजी स्कूल एक बार फिर से अपने नाखून और दांत दिख रहे हैं। वे न तब बेचारे है न कभी थे। एक सामान्य पालक अपने निवास स्थान के नजदीक किसी निजी स्कूल में अपनी संतान को शिक्षा संस्कार निजी स्कूल में प्रारंभ करा कर जीवन की गंभीर भूल कर देता है। एक मुस्त प्रवेश शुल्क, हर महीने की फीस के अतिरिक्त स्वतंत्रता दिवस जैसे अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रतिभागी बनने वाले प्रत्येक छात्र से ₹500 इसे क्या कहेंगे, जुल्म, डकैती, भयादोहन या प्रतिभा निखारने का शुल्क.... मोपका क्षेत्र में इन दिनों जैसे-जैसे रहवासी क्षेत्र बढ़ रहा है वैसे-वैसे निजी स्कूलों की संख्या भी बढ़ रही है उन्हें में से एक निजी स्कूल का यह कारनामा है। पालक का दोहन यही नहीं रुकता यदि छात्र एक से अधिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा ले तो उसके लिए भी अतिरिक्त ₹500 निर्धारित है। सूक्ष्मता से विश्लेषण करें यहीं से प्रारंभ होता है भ्रष्टाचार या नव नक्सलवाद एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए ₹500 देना पड़ा यह बात जब छात्रा को पता चलेगी और जीवन भर उसे इस 500 का ज्ञान रहेगा। वह इसे किस रूप में लेगा अपनी ही प्रतिभा अपने लोगों के बीच अभिव्यक्त करना हो तो पैसा देना पड़ता है यदि छात्र व्यवस्था विरोधी मानसिकता रखने वाला हो तो जैसे-जैसे शिक्षा ग्रहण करेगा वह बचपन में दिया गया ₹500 व्यवस्था में कहां गया खोजेगा और व्यवस्था में बैठे लोगों से अपनी ताकत के दम पर एक 500 सौ के बदले कई ₹500 वसुलेगा। नहीं मिलने पर व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोगों का शीश उतार लेगा निजी स्कूल की लुटेरी प्रवृत्ति समाज के देश को पिछले 5 दशकों से गर्त में डाल रही है।