वि वि की बौद्धिक स्वतंत्रता खतरे में
- By 24hnbc --
- Thursday, 25 Mar, 2021
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पिछले दिनों शैक्षिक जगत में उस समय हलचल मच गई, जब राजनीतिक विश्लेषक और लेखक प्रताप भानु मेहता ने सोनीपत स्थित ग़ैर सरकारी विश्वविद्यालय अशोका यूनिवर्सिटी से प्रोफ़ेसर के पद से त्यागपत्र दे दिया.अपने त्यागपत्र में मेहता ने कहा कि विश्वविद्यालय के संस्थापकों के साथ एक बैठक के बाद उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि विश्वविद्यालय से उनका जुड़ाव एक 'राजनीतिक बोझ' माना जा सकता है.उन्होंने यह भी कहा कि चूँकि उनका सार्वजनिक लेखन स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल्यों और सभी नागरिकों के लिए समान सम्मान का प्रयास करने वाली राजनीति के लिए है, ये भी विश्वविद्यालय के लिए जोख़िम उठाने जैसा समझा जा सकता है.मेहता के त्यागपत्र के कुछ दिन बाद सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी अशोका यूनिवर्सिटी से इस्तीफ़ा दे दिया.सुब्रह्मण्यम ने अपने त्यागपत्र में कहा कि यह बात उनके लिए परेशान करने वाली थी की मेहता जैसे व्यक्ति ने ख़ुद को विश्वविद्यालय छोड़ने के लिए मजबूर पाया. इन दो बड़े नामों का एक साथ अशोका यूनिवर्सिटी को छोड़ देना भारत के शैक्षिक जगत के लिए एक झटके के समान था.बड़े पैमाने पर इस बात की चर्चा हुई. रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस मामले को बोलने की आज़ादी पर एक गंभीर चोट कहा.एक सोशल मीडिया पोस्ट में राजन ने मेहता को सरकार के लिए एक काँटा बताया. उन्होने कहा, "अशोका यूनिवर्सिटी के संस्थापकों को यह महसूस करना चाहिए कि उनका मिशन वास्तव में राजनीतिक पक्ष लेना नहीं था, बल्कि प्रोफ़ेसर मेहता जैसे लोगों के बोलने के अधिकार की रक्षा करना जारी रखना था."इस घटनाक्रम को दुखद बताते हुए राजन ने यह भी कहा कि बोलने की आज़ादी एक महान विश्वविद्यालय की आत्मा है और इस पर समझौता करके संस्थापकों ने विश्वविद्यालय की आत्मा का सौदा किया है.कई विदेशी शिक्षाविदों ने भी प्रताप भानु मेहता के प्रति समर्थन जताया. ऑक्सफ़र्ड, कैम्ब्रिज, कोलंबिया, येल, हार्वर्ड, और प्रिंस्टन सहित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के 150 से अधिक शिक्षाविदों ने विश्वविद्यालय के ट्रस्टियों और प्रशासकों को एक खुले पत्र में कहा कि वे इस बात से व्यथित हैं कि मेहता को 'राजनीतिक दबाव' के चलते विश्वविद्यालय छोड़ना पड़ा.वहीं दूसरी ओर अशोका यूनिवर्सिटी के छात्र संगठन ने कक्षाओं के बहिष्कार का आह्वान करते हुए कहा कि छात्र दोनों प्रोफ़ेसरों के इस्तीफ़े से बेहद दुखी हैं और जिन शर्तों के तहत इस्तीफ़े हुए हैं, वे उनसे असंतुष्ट हैं.छात्रों ने कहा कि उन्होंने न केवल बौद्धिक दिग्गजों को खो दिया है, बल्कि उस विश्वास को भी खो दिया है कि विश्विद्यालय प्रशासन उन्हे बाहरी राजनीतिक दबावों से बचाएगा.अशोका यूनिवर्सिटी ने पूरे मामले पर 'गहरा अफ़सोस' जताते हुए यह माना कि उसकी 'संस्थागत प्रक्रियाओं में कुछ ख़ामियाँ हैं.' लेकिन वो ख़ामियाँ क्या हैं, इस पर विश्वविद्यालय ने कुछ नहीं कहा. लेकिन इतना ज़रूर कहा कि विश्वविद्यालय उनख़ामियों को सुधारने के लिए काम करेगा,


