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राधा का नाम अनमोल बोलो राधे राधे--पं लोकेश महराज

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बिलासपुर, 17 अक्टूबर 2026। ( राघवेंद्र सिंह )
वार्ड क्रमांक 15 केसला बिल्हा में लगातार 6 दिनों से भागवत कथा का आयोजन बड़े ही धूमधाम से नवरात्रि के पावन बेला में हो रहा है जिसमें आयोजक श्रीमती सुखबाई यादव के द्वारा कराया जा रहा है जिसमें गरियाबंद जिले के श्री सिद्धि विनायक आश्रम फिंगेश्वर से पधारे पंडित लोकेश महराज मिश्र के द्वारा लगातार भागवत कथा का रसपान संगीतमय ध्वनि एवं प्रवचन के साथ कराया जा रहा है और पहले दिवस जल यात्रा, गौकर्ण पूजा,बेदी पूजा एवं भागवत कथा दूसरे दिवस कथा प्रारंभ, परिक्षित जन्म एवं वारह अवतार तीसरे दिवस सति चरित्र, ध्रुव चरित्र तथा भरत चरित्र, चौथे दिवस अजामिल चरित्र, प्रहलाद नरसिंग अवतार पंचम दिवस समुद्र मंथन,श्री कृष्ण जन्म एवं दही लूट और छठे दिवस में श्री कृष्ण लीला, छप्पन भोग एवं रुक्मणी विवाह का कथा हुआ जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामवासी क्षेत्रवासी परीक्षित प्रवासी उपस्थित रहे। 
 
*श्री कृष्ण लीला, छप्पन भोग एवं रुक्मिणी विवाह का रोचक कथा*
 
पंडित लोकेश महाराज मिश्र ने कथा में आज बताया कि भगवान श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में मथुरा के कारागार में माता देवकी और पिता वासुदेव के यहां भाद्रपद किस स्टेशन की मध्य रात्रि को हुआ था। कंस की हत्या शहरों से बचने के लिए जन्म लेते ही वासुदेव ने उन्हें यमुना पार करके गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के पास पहुंचा दिया।गोकुल में रहते हुए बालकृष्ण ने माखन चोरी की माता यशोदा को विश्व रूप के दर्शन कारण और पटना जैसी राक्षसी का वध किया।यमुना नदी में रहने वाले जहरीले कालिया नाग का मान मर्दन कर उसे प्राप्त किया ब्रज वासियों की रक्षा के लिए अपनी कनिष्ठ का उंगली पर गोवर्धन पर्वत धारण किया और इंद्र का अहंकार भी तोड़ा। भगवान श्री कृष्ण को 'गिरधर' (या गिरधारी) इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने ब्रजवासियों की मूसलाधार बारिश से रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी बाएं हाथ की कनिष्ठा (छोटी) उंगली पर उठा लिया था।युवावस्था में मथुरा लौटकर अपने मामा कंस का वध किया और माता-पिता को कारागार से मुक्त कराया 
 
*56 प्रहर का गणित*
 
पं लोकेश महाराज जी ने कहा कि शास्त्रों के अनुसार, माता यशोदा बालकृष्ण को प्रतिदिन आठ प्रहर (आठ बार) विभिन्न प्रकार का भोजन कराती थीं। लगातार सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठाए रखने के कारण कान्हा सात दिन तक बिना अन्न-जल के रहे।
 
*भोजन की भरपाई*
 
7 दिन × 8 प्रहर = कुल 56 प्रहर का भोजन कान्हा का छूट गया था। सातवें दिन जब बारिश थमी और इंद्र का घमंड चूर हुआ, तब माता यशोदा और ब्रजवासियों ने लाड़-प्यार और आभार स्वरूप कान्हा को 56 प्रकार के अलग-अलग व्यंजन बनाकर खिलाए। तभी से छप्पन भोग की परंपरा शुरू हुई।
 
*रुक्मिणी का श्री कृष्ण को अपना मानना*
 
विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी अत्यंत सुंदर और गुणवान थीं। उन्होंने देवर्षि नारद के मुख से भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी लीलाओं के बारे में सुना था और मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति मान लिया था।
रुक्मिणी के बड़े भाई रुक्मी की श्रीकृष्ण से शत्रुता थी। वह नहीं चाहता था कि रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से हो। इसलिए उसने रुक्मिणी का विवाह चेदि नरेश शिशुपाल से तय कर दिया, जो श्रीकृष्ण के कट्टर विरोधी थे।जब रुक्मिणी को इस बात का पता चला, तो उन्होंने एक योग्य ब्राह्मण के हाथों श्रीकृष्ण के नाम एक प्रेम पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि वे आएं और उनका हरण करके उनसे विवाह करें, अन्यथा वे अपने प्राण त्याग देंगी।
भगवान श्रीकृष्ण ने उस ब्राह्मण की बात सुनी और बलराम जी के साथ अपनी सेना लेकर कुंडनपुर (विदर्भ) के लिए प्रस्थान किया। 
 विवाह के दिन रुक्मिणी माता अम्बिका के मंदिर में पूजा करने गईं। पूजा समाप्त करके जब वे बाहर आईं, तो श्रीकृष्ण ने अपने रथ पर उन्हें बैठा लिया और वहां से द्वारका की ओर ले चले
जब रुक्मी को इस बात का पता चला, तो वह अपनी सेना लेकर श्रीकृष्ण का पीछा करने लगा। श्रीकृष्ण ने युद्ध में रुक्मी को हरा दिया। तब रुक्मिणी के अनुरोध पर श्रीकृष्ण ने रुक्मी के प्राण तो बख्श दिए, पर दण्ड स्वरूप उसके सिर के बाल और मूछें आधी काट दीं। श्रीकृष्ण रुक्मिणी को लेकर द्वारका पहुंचे, जहां विधि-विधान और भव्य समारोह के साथ दोनों का विवाह संपन्न हुआ।
 
वृंदावन जाओगे तो राधे राधे बोलना पड़ेगा--पं लोकश महराज 
 
वृंदावन में हर किसी को अभिवादन या बातचीत के दौरान 'राधे-राधे' बोलना जरूरी नहीं माना जाता, लेकिन यह वहां की संस्कृति, परंपरा और भक्ति का सबसे प्रमुख हिस्सा है।
 मान्यता है कि वृंदावन की असली मालकिन श्री राधा रानी हैं और वहां उनका विशेष प्रभाव और शासन माना जाता है। वृंदावन, बरसाना और ब्रज क्षेत्र में लोग एक-दूसरे से मिलने पर 'नमस्ते' या 'हेलो' की जगह आपस में आदर और प्यार से 'राधे-राधे' कहकर ही अभिवादन करते हैं।
ऐसा विश्वास है कि 'राधा' नाम जपने से श्री कृष्ण बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि कृष्ण को खुद राधा का नाम सुनना सबसे अधिक प्रिय है।
भक्त मानते हैं कि 'राधे-राधे' का उच्चारण करने से मन को शांति मिलती है, नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।और पंडित लोकेश महाराज जी ने बताया कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के सारथी बने और गीता का दिव्य ज्ञान देकर धर्म की स्थापना की।