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छत्तीसगढ़ और उसके पड़ोसी, भाजपा के लिए बढ़ रही खतरे की घंटी

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बिलासपुर, 31 मई 2024।
मध्य प्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ राज्य की भौगोलिक सीमाएं जिन पड़ोसी राज्यों से मिलती है उसमें छत्तीसगढ़ ही लोकसभा के सीट संख्या की दृष्टि से सबसे छोटा राज्य है। यहां केवल 11 लोकसभा सीट है। मध्य प्रदेश में लोकसभा के 29, उड़ीसा में 21, उत्तर प्रदेश में 80, झारखंड में 14, महाराष्ट्र में 48, आंध्र प्रदेश में 25, तेलंगाना में 17 सीट रखने वाले राज्य हैं। इस तरह इन सीटों की कुल संख्या 245 होती है। यह एक बहुत बड़ा फिगर है 2024 के लोकसभा चुनाव में कहने को मुकाबला भाजपा वाले एनडीए गठबंधन और इंडिया गठबंधन के बीच है। पर असल मायनों में यह चुनाव नरेंद्र दामोदरदास मोदी विरुद्ध संसदीय लोकतंत्र बन गया है। और इंडिया गठबंधन अपने पूरे चुनाव प्रचार में महंगाई बेरोजगारी के साथ संविधान बचाओ, संसदीय लोकतंत्र बचाओ का नारा लेकर चला है।
 कल 1 जून लोकसभा चुनाव का 7 और अंतिम चरण संपन्न हो जाएगा। 10 वर्षों के मोदी कार्यकाल के दौरान 2 जून हो या साल के अन्य 364 दिन किसी भी सामान्य परिवार के लिए 2 जून की रोटी आसान नहीं रही भले ही सरकार 80 करोड़ को सस्ता अनाज देने का दम भरे। भारी भरकम लोकसभा सीट रखने वाले राज्यों के बीच छत्तीसगढ़ अब तक दो राजनीतिक दल के बीच ही गुजारा करता रहा हालांकि छत्तीसगढ़ में जब कभी भी सत्ता परिवर्तन हुए अन्य राजनीतिक दल ही कारण बने। इस बार छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का साथ भारतीय राजनीति की ओल्डनेस पार्टी कम्युनिस्ट और सबसे ताजा पार्टी आप सहित एनसीपी, सपा ने मिलकर चुनाव लड़ा। इंडिया प्रत्याशी के चुनाव प्रचार के दौरान समय-समय पर प्रचार में ऐसा देखा भी गया बिलासपुर में विधानसभा चुनाव के दौरान सक्रिय रहे एनसीपी के चेहरे निलेश विश्वास, आप से उज्जवला कराड़े, प्रियंका शुक्ला, जसवीर सिंह चावला और कम्युनिस्ट पार्टी के विभिन्न नेताओं ने जोरदार काम किया। यही कारण है कि इस बार 11 लोकसभा वाले छत्तीसगढ़ में भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है। और कांग्रेस की झोली में तीन से ज्यादा सीट जा सकती है। पड़ोसी मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29 सीट है। विधानसभा चुनाव के समय कमलनाथ के बिगड़े बोल के चलते सपा से तालमेल नहीं हो पाया था। पर इस बात में एक सीट समझौते के आधार पर मिली। मध्य प्रदेश की राजनीति बड़े भौगोलिक क्षेत्र को देखते हुए अलग-अलग क्षेत्र में बटी है। मालवा का मिजाज अलग है तो महाकौशल के सूर भिन्न है।
 छत्तीसगढ़ के पड़ोसी जिले शहडोल, अनूपपुर, अमलई क्षेत्र में तो आप का संगठन भी मजबूत होता जा रहा है, ऐसा माना जाता है कि विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित हर के बाद भी कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी और एसटी-एससी वर्ग में अपना जनाधार बढ़ाएगी। उड़ीसा एक ऐसा राज्य है जहां के चुनाव में छत्तीसगढ़ के काफी नेता प्रचार कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी उड़ीसा में भाजपा को सत्ता में लाने के लिए सक्रिय हैं। यहां विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ है। झारखंड का छत्तीसगढ़ से ट्राईबल और खनिज संपदा के चलते खूब याराना है। मुख्यमंत्री झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन के जेल जाने के बाद यहां की राजनीति में नारी शक्ति कल्पना सोरेन के रूप में तेजी से अब इतना प्रभावित हो चुकी है कि यहां की राजनीति में भाजपा को नई चुनौती का सामना करना पड़ेगा वह भी लंबे समय तक। महाराष्ट्र यहां की राजनीति में भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने खूब बुद्धी चातुरंग दिखाया अब दलदल में फंस गए लगते हैं। उद्धव ठाकरे, शरद पवार के राजनीतिक दलों में कम परिवार में ज्यादा तोड़फोड़, भाजपा को बहुत नुकसान करती दिख रही है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र यह दो राज्य भाजपा को चमक के स्थान पर कालीख पोतने वाले बन रहे हैं। दोनों राज्यों से भाजपा के लिए नकारात्मक ज्यादा खुशी देने वाली खबरें काम है। आंध्र प्रदेश में कुल 25 लोकसभा सीट है पर यहां विधानसभा के चुनाव साथ ही हो रहे हैं और यहां भी राजनीति में महिला शक्ति ने सिनेरियो में दमदार उपस्थिति दी। कांग्रेस ने अपनी कमान मुख्यमंत्री की बहन शर्मिला के हाथों शौप रखी है। वही एनटीआर की बेटी डी पुरंदेश्वरी भाजपा की राज्य अध्यक्ष है। पूरा चुनाव राजनीतिक परिवारों के बीच घमासान है और राज्य में मुख्यमंत्री जगत मोहन रेड्डी की कल्याणकारी योजनाओं के चलते बढ़ता हुआ कर्ज औसतन हर महीने 9226 करोड रुपए बढ़ा मुद्दा बन गया है। तेलंगाना में विधानसभा चुनाव के मार्फत जो जीत दर्ज की उसने सभी राजनीतिक समीक्षा को चौका दिया और भाजपा यहां दूसरी नहीं तीसरी पार्टी बन गई। भय से प्रेम यहां भी उसे नुकसान ही दिया।
छत्तीसगढ़ के पड़ोसी 7 राज्य की राजनीति आज नहीं तो कल छत्तीसगढ़ को भी प्रभावित करेगी। छत्तीसगढ़ में एसटी-एससी को एक तरफ रख ओबीसी की राजनीति लंबी नहीं चलने वाली फिलहाल ये चुनाव तो संविधान और संसदीय लोकतंत्र बचाओ वाला है। फिर भी विपक्षी दलों में आपस में समझदारी के साथ चुनाव लड़ा, परिणाम का दिन 4 जून अब दूर नहीं....।