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विलुप्त हो रही कला को फिर से जगाया नमो ने

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बिलासपुर, 26 मई 2024।
भारत देश में हमेशा कलाओं का सम्मान हुआ है ऐसा कहा जाता है कि एक समय था जब गठित उच्च वर्ग और धनाढ्य परिवार के युवा तवायफों के कोठे पर तहजीब सीखने भेजे जाते थे। तवायफ जिस नित्य कला का प्रदर्शन करती थी उसे "मुजरा" कहा जाता था। धीरे-धीरे इस कला का पतन हो गया और इसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाना बंद हो गया। 2014 में जब भारत एक बार फिर से स्वतंत्र हुआ (कंगना अनुसार) और उसका नेतृत्व नमो को मिला। जिसे इन दोनों मोदेश्वर कहा जाता है। ने अपने इस प्रवचन में इस कला का नाम लिया और देखते ही देखते मुजरा गूगल पर सर्च किया जाने लगा आंकड़े आने लगे कि देश की लगभग 60% वोटर भाजपा को वोट नहीं करता और उसी के समक्ष मुजरा किया जाता है। अर्थात इस कला के प्रेमी बहुत बड़ी संख्या में हैं वैसे भी हमारा इतिहास बताता है कि कब-कब किस-किस अध्यात्म, जागृत आत्माओं ने किस नगरवधू से संवाद किया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में भी इस वर्ग की भूमिका रही है और सकारात्मक रही है।