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बॉन्ड असंवैधानिक है, नैतिक ही नहीं कानूनी उत्तरदायित्व से भी कैसे बचेंगे पीएम
- By 24hnbc --
- Thursday, 15 Feb, 2024
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बिलासपुर, 16 फरवरी 2024।
इलेक्ट्रॉल बॉन्ड को सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्य पीठ जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस कर रहे थे ने सर्वसम्मति से असंवैधानिक घोषित कर दिया। 13 मार्च तक देश के मतदाताओं और नागरिकों के सामने किस कंपनी, सेल कंपनी, व्यक्ति ने किस राजनीतिक दल को कितनी धनराशि दी, कब-कब दी पब्लिक डोमेन में आ जाएगा। उच्चतम आदेश से भारतीय लोकतंत्र चुनाव राजनीतिक दल आदि पर व्यापक प्रभाव पड़ा। इस निर्णय से सर्वाधिक प्रभावित राजनीतिक दल का नाम केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी है।
तथाकथित पारदर्शिता सुचिता को नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कैबिनेट मंत्री अरुण जेटली ने इतना सब कुछ अपने आप किया हो या संभव ही नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता कि फाइनेंस बिल जिसे जेटली लाए थे उसके लिए प्रधानमंत्री की हरी झंडी नहीं रही हो, हमारे देश में तो सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत कार्यकर्ता है लिहाजा इस्तीफा तो केंद्रीय मंत्रिमंडल का होना चाहिए पर यह अमृत कल है नैतिकता के आधार पर इस्तीफे तो 2014 के पहले होते थे। अब तो बेशर्मी का लबादा ओढ़ कर सब कुछ राष्ट्रीय भक्ति और राम भक्ति में छुपाया जाता है। आरबीआई एक्ट, इनकम टैक्स एक्ट, कंपनी एक्ट, जनप्रतिनिधित्व कानून और विदेशी आर्थिक मदद के कानून में मनमर्जी परिवर्तन को पीठ ने गलत माना काश ऐसा ही फैसला नोटबंदी के मामले में आया होता पर उसे समय यह हिम्मत केवल एक न्यायाधीश ने दिखाई थी नोटबंदी पर भी आरबीआई की सहमति नहीं थी। इलेक्ट्राल बॉन्ड पर भी नहीं थी। बॉन्ड पर तो आरबीआई ने स्पष्ट कहा बॉन्ड से भारतीय मुद्रा के समक्ष एक एक अलग मुद्रा खड़ी हो जाएगी और पूरा ढांचा संकट में आ जाएगा आ गया है। कारपोरेट जगत का अर्बन का रन कैसे माफ हुआ कहीं इसके पीछे इलेक्ट्रॉल बॉन्ड ही तो नहीं 13 मार्च को पता चल जाएगा। इलेक्ट्रॉल बॉन्ड केवल लोकतंत्र को नुकसान नहीं पहुंचा रहा था देश के अर्थव्यवस्था को कुछ चुनिंदा लोगों के लिए देश के प्रधानमंत्री द्वारा संचालित किया जा रहा था। भारतीय जनता पार्टी जिसे पप्पू, रावण और जाने क्या-क्या उपाधि देती है ने 2018 में ही इलेक्ट्रॉल बॉन्ड को देश के साथ धोखा बताया था। गोद में बैठी मीडिया इस समय कितना भी झूठ दिखाएं असल स्थिति पेटीएम, किसान आंदोलन, ओल्ड पेंशन स्कीम जैसे मुद्दे बता रहे हैं कि देश की आर्थिक स्थिति नियंत्रण के बाहर है। और अब चुनाव है ऐसे में संवैधानिक संस्थाओं की बड़ी परीक्षा है।


