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"हिंदी पत्रकारिता दिवस" हम बधाई देकर बेशर्म नहीं बन सकते

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बिलासपुर, 30 मई 2026।
जिम्मेदारी और उत्तरदाई इस दौर में दो अलग-अलग चीजें हैं पहले जो जिम्मेदारी लेता था वो उत्तरदाई भी होता था पर ये अमृत काल है यहां पर जिम्मेदारी तो शीघ्र ली जाती है पर उत्तरदाई नहीं बन जाता। आज 30 मई 2026 है। "हिंदी पत्रकारिता दिवस " जो लोग हिंदी पत्रकारिता के इन दो नाम जुगल किशोर और गणेश शंकर विद्यार्थी के पद चिन्हों पर नहीं चल सकते ना ही प्रयास करते हैं उनके अखबार हिंदी पत्रकारिता दिवस पर बड़ी-बड़ी आदर्शवादी बातों के साथ आज सुबह निकले हैं। 
2014 के बाद तो हिंदी पत्रकारिता इंद्र का दरबार हो गई है। पत्रकारिता के बड़े देवी देवता जो एंकर और एंकरनिया है दरबार में ताता थैया करते दिखाई देते हैं। एक समय था जब देश में सांप्रदायिक हिंसा को रोकने धर्मनिरपेक्षता को बढ़ाने की बातें हिंदी मीडिया करता था अब हिंदू मुसलमान, और सांप्रदायिक हिंसा कैसे हो जाए की खोज सुबह से शुरू हो जाती है। महिला अपराध की खबरें यह देखकर लगाई जाती हैं की घटना जिस राज्य या जिले में हुई है वहां पर राजनीतिक दल किसका है। राष्ट्र की राजधानी से लेकर जिला मुख्यालयों तक पत्रकारिता की यह स्थिति है कि किसी प्रभावित को अपनी बात कहनी हो तो उसे पत्रकारिता के दरबार में साष्टांग करना पड़ता है। उसके बाद अभी बोलने बताने की जगह मिलेगी या नहीं या नहीं, नहीं पता हम क्या सुनेंगे यह भी देवता ही तय करता है। 
हिंदी के अखबारों से रिपोर्टिंग गायब है चाटुकारिता टॉप पर है यहां तक की संपादकीय पृष्ठ भी तेल, टीपा, कनस्टर की संस्कृति में ढल गए। कौन अपने देवता को तेल से कितना नहला सकता है यह छुप के नहीं खुल्लम खुल्ला किया जाता है। किसी पत्रकार का देवता टीआई, एसपी, आईजी तो दूसरी ओर तहसीलदार, एसडीम, कलेक्टर, कमिश्नर हो सकता है। जो जिस शहर में बैठा है पत्रकारिता करने वह वैसा देवता चुनता है। दिल्ली का देवता कोई और है। तो रायपुर बिलासपुर का कोई और छोटा राज्य होने से देवताओं की संख्या बढ़ गई है और भक्तों की पहुंच देवताओं तक हो गई। हिंदी दिवस रिढ विहीन की बधाई देना बेशर्मी हो जाएगा। अब तो चिंता महंगाई की है क्योंकि महंगाई ने तेल से लेकर कपूर तक यहां तक की पानी भी महंगा कर दिया पर महंगाई पर चर्चा करने से हमारी देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह लग जाएगा।