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केवल प्रस्तावना का पाठ करने से नहीं बचेगा संविधान
- By 24hnbc --
- Saturday, 25 Nov, 2023
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बिलासपुर, 30 अक्टूबर 2023।
25 नवंबर को संविधान सभा में डॉ अंबेडकर ने कहा था संविधान अच्छा या बुरा नहीं होता, अच्छे से अच्छा संविधान का अच्छा या बड़ा होना उसके लागू करने वालों की नियत पर निर्भर करता है। आज 26 नवंबर को देश में सब तरफ भारतीय संविधान की प्रस्तावना को पढ़कर संविधान दिवस मनाया जा रहा है। कहीं-कहीं यह काम अंबेडकर प्रतिमा के आसपास किया जाता है।
भारत का संविधान सामाजिक, आर्थिक न्याय का दस्तावेज है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी अपने भाषण में कहा था शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक बराबरी जरूरी है। सवाल उठता है समाजवादी सोच को लेकर प्रारंभ हुए देश की व्यवस्था पर क्रॉनिक पूंजीवाद का कब्जा कैसे हो गया। 82 करोड़ लोग घर के चूल्हे और मुट्ठी भर अनाज के लिए सरकार की सब्सिडी पर निर्भर हैं। अभी हम विश्व की पांचवी अर्थव्यवस्था नहीं बने हैं। तब यह हाल है जिस तरीके से पिछले 10 साल का हुक्मरान चल रहा है। नेता की फोटो लगी अनाज वाली झोली लेने वालों की कतार 82 करोड़ से 1 अरब हो जाएगी। तब भी क्या हम 26 नवंबर को संविधान का प्रस्तावना पढ़कर खुश हो सकेंगे। आज हमारे नागरिकों की वैज्ञानिक सोच का आलम भटक चुका है। हमने आस्था पर अत्यधिक भरोसा और वैज्ञानिक सोच को झटक दिया है जब हमारी आंतरिक एजेंसी बैलगाड़ी पर रखकर प्रक्षेपण के लिए उपग्रह ला रही थी तब हमारी सोच ज्यादा वैज्ञानिक थी, बनसपद आज के संविधान सभा में कितने लोग थे। पाकिस्तान बन जाने के कारण उनकी संख्या में कितनी कमी हो गई पहली बैठक में 324 सदस्यों में से 205 पुरुष और 9 महिलाएं ही आए थे पर उनकी नियत साफ थी।
आज नियम निर्माण संस्था चाहे वह लोकसभा हो या विधानसभा महिलाओं की संख्या भले ही पहले के मुकाबले बढ़ गई पर सदन में बैठी महिलाएं पार्टी बाजी के खेमे में बंध कर न्याय अन्याय का पक्ष देखती हैं। संविधान निर्माता में एसटी वर्ग के 33 नुमाइंदे थे। महिलाओं की संख्या 15 थी पर उन्होंने अपने-अपने पक्षों की सम्मान की रक्षा के लिए बेहतर नियम बनवाए पर आज एसटी वर्ग के तमाम माननीय जल जंगल जमीन की रक्षा के लिए क्या कर रहे हैं।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पीएचडी में आरक्षण रोस्टर का पालन नहीं होता माननीय चुप क्यों हैं.....? एसटी वर्ग को आदिवासी के नाम से ना पुकार कर वनवासी घोषित किया जा रहा है। माननीय चुप क्यों है आदिवासी समाज के जानकार बताते हैं कि समाज में संवाद समाप्त हो रहा है इस तरह देश में चेक एंड बैलेंस समाप्त हो रहा है। विपक्ष की सकारात्मक राजनीति लिखने मात्र से निजी क्षेत्र की नौकरियां चल देती है। शासन में बैठे कुछ लोग संविधान संशोधनों से संतुष्ट नहीं है अहंकार इतना की नया संविधान बनाने की कोशिश को अमलीजामा पहनाने की हिम्मत हो रही है। और 26 नवंबर को ऐसी ही ताकते प्रस्तावना का पाठ करके कर्तव्य की इतिश्री कर रही है।


