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किताबों से लगता है डर और जो उसे पढ़ता है वह तो सत्ता की नजर में राष्ट्रद्रोही है

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बिलासपुर,5 अक्टूबर 2023।
विश्व प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में कुल 180 देश की सूची में भारत का नंबर 161 पर है। 2014 में 142 पर था बड़ी खाई उतारने का डंका हमने पीटा हम मदर ऑफ डेमोक्रेसी है। गांधी जी के एक दिन को छोड़ शेष 364 दिन हम वह करते हैं जिससे हमारा लोकतंत्र रोज कहीं ना कहीं किसी न किसी तरीके से कमजोर होता है इसी कड़ी में 3 अक्टूबर को दर्जनों पत्रकारों के घर पर दिल्ली पुलिस ने छाप मार्ग कार्यवाही की साथ में सीआईएसएफ को भी ले लिया यह एक खतरनाक संकेत है। 
प्रेस की आजादी नहीं तो लोकतंत्र नहीं, मुंबई के कोट ने तो टॉलेस्ट टॉय की किताब रखने को भी संदिग्ध मान लिया था। लोकतंत्र में किताबों से इतना डर या फिर ऐसा माना जाए की कुछ किताबों से इतना डर और कुछ की पूजा और जिस चीज की पूजा करते हैं उसको पढ़ने नहीं है। 
पत्रकारों के घर पर छापा मारा उनके लैपटॉप मोबाइल जप्त कर लिए उन्हें एफआईआर की कॉपी नहीं दी गई का किसी का मोबाइल लैपटॉप जप्त करना निजता के अधिकार का उल्लंघन है और निजता का अधिकार भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार के अंतर्गत गिना जाता है। और ऐसा लगता है और अब मौलिक अधिकार सिर्फ गिनती में ही रह गए हैं। इसके पहले 2021 में भीमा कोरेगांव के मामले में यह बातचीत हो चुकी है कि किसी के लैपटॉप या कंप्यूटर अथवा मोबाइल में उसकी जानकारी के बगैर किसी सूचना को कैसे प्लांट कर दिया जाता है ऐसे में जपती के पूर्व हैजटेक सूची के बगैर डिवाइस को जांच एजेंसी जप्त कैसे कर सकती है। जो व्यक्ति लैपटॉप या किसी भी किस्म की डिवाइस रखा है उसे स्वयं नहीं पता कि उसके डिवाइस में कितना डाटा स्टोर है कितनी फाइलें मौजूद है यदि जांच एजेंसी डिवाइस को जब् करती है तो जब्ती पूर्व यह उसका कर्तव्य है कि वह डिवाइस का डाटा वैल्यू डिवाइस के मलिक को बताएं जिससे जब डिवाइस वापस हो तो मालिक यह देख सके कि उसके डिवाइस में से कुछ घटा या बढ़ा दिया अन्यथा यही जांच एजेंसी फिर किसी दिन जांच के बहाने आएगी और अबकी बार इस डिवाइस में से ऐसी जानकारियां निकाल दी जाएगी जिससे डिवाइस का मालिक राष्ट्र विरोधी घोषित हो जाए, आतंकी घोषित कर दिया जाए या उसके संबंध प्रतिबंधित संगठनों से सिद्ध कर दिया जाए।
देश की सुरक्षा के नाम पर 2014 के बाद से बड़े पैमाने पर यूएपीए का उपयोग हो रहा है राष्ट्रीय जांच एजेंसी और पुलिस ने यूएपीए के अंतर्गत 16 वकीलों प्रोफेसर और कार्य कर्ताओं की गिरफ्तारी की भीमा कोरेगांव मामले में जेल में बंद किया 2023 तक 14 कार्यकर्ता जमानत पर हैं। गिरफ्तार किए गए लोगों में से एक फादर स्टैंड स्वामी 83 साल की मौत तो जेल में हुई उन्हें एक शीपर के लिए भी उच्चतम न्यायालय तक आना पड़ा। 5 सालों में यूएपीए के मामलों में 72% की वृद्धि हुई पिछले 7 साल में सूनवाई के लिए 6900 मामलों में से केवल 4.5% ही नतीजे तक पहुंचे 95.4 मामलों में अभी तक लंबित हैं। ऐसे में हमारी सरकार एक कश्मीर को सुलझा नहीं पाती और एक मणिपुर पैदा कर लेती है विदेश नीति की चर्चा ना तो सदन में होती है ना बाहर करने दी जाती है जनवादी मुद्दों पर लिखने कहने वाले को चीनी घोषित कर दिया जाता है। ऐसा ही एक समय था जब निष्पक्ष बात करने वाले को पाकिस्तान जाने की सलाह दे दी जाती थी। सरकारों को अपनी आलोचना पसंद नहीं है उन्हें अच्छे लगते हैं अंधभक्त, पत्तलकार, चाटुरकार। जनता की जब पत्रकारों को पूछने नहीं दिया जाएगा उनका मुंह बंद कर दिया जाएगा तब पूछने का अधिकार जनता स्वयं यदि लेना चाहेगी तब उनके साथ क्या व्यवहार होगा।