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एसटी की डीलिस्टिंग बनेगा चुनावी मुद्दा

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समाचार -
बिलासपुर, 15 मई 2023। छत्तीसगढ़ में नौकरी का पिटारा खुलने के साथ ही आदिवासियों के डीलिस्टिंग का आंदोलन सक्रिय हो गया है और यह आंदोलन आर एस एस और उसके अन्य संगठनों द्वारा चलाया जा रहा है। जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत जो डॉक्टर रमन के मंत्रिमंडल में भी शामिल थे इस आंदोलन में अगुआ हैं वह कहते हैं जिन आदिवासियों ने ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाया जन जाति प्रथा छोडी उसका आरक्षण बंद हो जाना चाहिए। बस्तर से लेकर सरगुजा तक डीलिस्टिंग को लेकर रैली, आंदोलन, ज्ञापन रोज की बात है। जहां पर यह भी ध्यान देना चाहिए कि मुख्य मार्ग से हटकर अंदर के क्षेत्रों में धर्मांतरण को लेकर छत्तीसगढ़ में कई स्थानों पर तनावपूर्ण स्थिति है अब जब विधानसभा चुनाव के कुछ माह ही शेष है तब ही डीलिस्टिंग का आंदोलन अपने आप में बड़े संकेत देता है। आदिवासी परंपरा छोड़कर जो ट्राइबल हिंदू बने उन्हें डीलिस्टिंग पर आंदोलन के अगुआ चुप हो जाते हैं। अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के प्रदेश अध्यक्ष संत कुमार नेताम कहते हैं कि असल में डीलिस्टिंग आंदोलन के पीछे बड़े उद्योग घराने भी लगे हुए हैं वे मानते हैं कि यह मामला केवल आरक्षण से वंचित करने का नहीं है वन अधिकार पट्टा पांचवी आठवीं सूची पंचायत अटेंशन शेड्यूल एरिया सब पर प्रभाव पड़ेगा जब ट्राइबल को उस सूची से ही निकाला जाएगा तब छत्तीसगढ़ में ट्राइबल की संख्या अपने आप प्रभावित होगी। छत्तीसगढ़ की 3 करोड़ की जनसंख्या में 32% एसटी हैं 2011 की जनगणना के मुताबिक मुसलमानों की संख्या 2.02%, ईसाई 1.92%, सीख 0.2 7%, बौद्ध 0.2 8% और जैन 0.2 4% हैं। एसटी का वोट 90 विधानसभा सीट में से 30 पर हार जीत तय करता है ऐसे में डीलिस्टिंग का हल्ला अपने आप में बड़े संकेत देता है। असल में जनगणना में एसटी को क्या लिखा जाता है महत्वपूर्ण है 1891 में इन्हें एसटी फॉरेस्ट ट्राईव की श्रेणी दी गई 1901 में एनीमिस्ट कहा गया। 1911 में ट्राइबल एनीमिस्ट 921 में हिल एंड फॉरेस्ट ट्राईव इस तरह जनगणना में इनके कॉलम को समय-समय पर बदला गया है इस बार जातिगत जनगणना पर जिस तरह खुली डिबेट हो रही है वैसी खुली डिबेट एसटी को लेकर नहीं हो रही है पर छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव को यह मुद्दा प्रभावित करता है।