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उड़ते गिद्धों के शहर में कौन मना सकता है दिवाली, लाशों के ढेर पर तुम्हें माननी है तो मैं कुछ नहीं कहता...

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बिलासपुर, 10 अक्टूबर 2026। 
जिन्हें हम माननीय, मी लॉर्ड कहते हैं वे आज कैसी भाषा का उपयोग कर रहे हैं। देश के सम्माननीय नागरिकों के लिए कभी कॉकरोच तो कभी मक्खी क्यों नहीं समझने की इन्हीं कॉकरोच और मक्खियों के चुकाए गए टैक्स की दम पर माननीय को कारकेट मिलता है। प्रधानमंत्री के हवाई जहाज आते हैं कितनी मक्खी और कॉकरोच उनके जो बुलेट प्रूफ कर में चलते हो पर उनकी मेहनत की कमाई से पूरा मंत्रिमंडल, न्यायपालिका, कार्यपालिका के बजट बनते हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश ने एक बार युवाओं को कॉकरोच कहा था और फिर जंतर मंतर पर उन कॉकरोच का कमाल भी देखा। 9 तारीख को फिर एक टिप्पणी हुई मक्खियों को करने के लिए हथौड़े का उपयोग नहीं किया जा सकता हिंदी में अपनी बातों को रखने के लिए इससे अच्छी लोकोक्ति या मुहावरा हो सकता है होता है और है बेहतर होता विद्वान न्यायाधीश महोदय समूह मनोविज्ञान को नियंत्रित करने के लिए क्या किया जा सकता है पर कुछ कहते । उल्टे उन्होंने मक्खी मारने के लिए हथौड़े के उपयोग की कहावत बोल दी, कार से कुत्ता भी मर जाए तो दुख होता है यहां तो व्यवस्था ने जाने कितने नागरिकों को मार कर, मरवा कर सत्ता हासिल की है। हिंदी सिनेमा की एक पिक्चर है मक्खी व्यवस्था याद रखें कर्म फल सिद्धांत के अनुसार एक भी मक्खी में कोई पुराना गुप्त भोगी पुनर्जन्म लेकर आ गया तो लुटियन कब्र में पहुंच जाएंगे और मक्खियों या कॉकरोच जहां से आए हैं वहां चले जाएंगे। लोकतंत्र में जब इसी व्यवस्था को नागरिकों के वोट चाहिए होते हैं तो उन्हें यह नागरिक देव तुल्य नजर आते हैं और जब वे सत्ता में बैठ जाते हैं तो यही देव तुल्य नागरिक उन्हें कॉकरोच और मक्खी नजर आने लगते हैं।देश के नागरिकों को कॉकरोच और मक्खी कहा तो अमेरिका के मंत्री ने कल ही कहा है कि हम सांप का सर काट रहे हैं आखिर कब तक इस तरह की भाषा हमारा नेतृत्व प्रधान सेवक सुनेगा लगता है की अब वह भी मानने लगा है कि वह कॉम्प्रोमाइजड प्रधान सेवक है।