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6 महीने में ऐसा परिवर्तन, डायोसिस की स्थिति हक्का-बक्का

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बिलासपुर, 24 मई 2026।
छत्तीसगढ़ डायोसिस और छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ़ एजूकेशन के कथित पदाधिकारी के खिलाफ जिस तरह से राष्ट्रीय बजरंग दल ने सिविल लाईन थाना रायपुर के सामने 5 घंटे प्रदर्शन किया और पुलिस के आला अधिकारियों को वहां पर रोके रखा। इसे समझ आता है कि आंदोलनकारियों के पक्ष में कहीं ना कहीं सरकार का एक तबका तो है। मामला केवल सालेम स्कूल के निलंबित शिक्षकों का नहीं है इससे ज्यादा गहरा है। याद रखें 25 दिसंबर के पूर्व बजरंग दल जैसे संगठनों ने रायपुर में एक से अधिक स्थान पर सांता क्लॉस को तोड़ा था। 6 महीने के भीतर ऐसा हृदय परिवर्तन क्या हो गया की बजरंग दल छत्तीसगढ़ डायोसिस बोर्ड ऑफ़ एजूकेशन की तानाशाही के खिलाफ शिक्षकों के समर्थन में खड़ा हो गया। इसे प्रायश्चित तो नहीं कहा जा सकता मामला इससे ज्यादा गहरा है। डायोसिस और एजुकेशन बोर्ड का पदाधिकारी स्वयं को आरएसएस और सत्ताधारी दल के नजदीक होने से खूब बताता है। ईसाई समाज का सामान्य व्यक्ति ऐसा मानता है कि उसकी संस्था के प्रमुख अब धार्मिक औधेदार न होकर एक राजनीतिक दल के नुमाइंदे हैं। और सत्ताधारी दल के नजदीक होने के कारण उन्हें संरक्षण प्राप्त है। तभी तो मल्टीपल एफआईआर के बावजूद उन्हें जेल यात्रा नहीं करना पड़ता। 
एक दशक का ईसाई समाज का इतिहास उठाकर देखें। धार्मिक संस्था के बड़े पदाधिकारी जेल यात्रा कर चुके हैं। एक समय था जब इस समाज में जो प्रमुख बनता था वह उच्च शिक्षित हुआ करता था। इनसे उनके स्तर पर प्रतिस्पर्धा कठिन नीति तो तोड़ निकाला गया कि लम्पटो को कम पर लगा दो। और लंपट लोगों ने अच्छी मुद्रा को पदों से बाहर कर दिया। अब खराब मुद्रा धर्म के बाजार पर ताबीज है और व्यवस्था ऐसी है कि कोई विसीलब्लोअर और आरटीआई एक्टिविस्ट नियम के दायरे में तो इसे नहीं निपट सकता। ऐसे में धरना प्रदर्शन, घेराव, पुतला दहन जैसे तरीका ही कारगर होंगे। पर इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होगा कि साध्य और साधन दोनों की पवित्रता खत्म हो जाएगी। जो वर्तमान व्यवस्था में अनोखी बात नहीं है।