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खेल से लेकर पत्रकारिता तक, कचरे का हो रहा फैलाव

कचरे का विनिष्टीकरण जरूरी है

24hnbc.com 
बिलासपुर, 27 अक्टूबर 2025। 
खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर करती है। यह सिद्धांत केवल अर्थशास्त्र में लागू होता है ऐसा नहीं है। इन दोनों बिलासपुर जिले में यह सिद्धांत खेल संगठन के क्षेत्र में, पत्रकारिता के क्षेत्र में और उसे एजेंसी पे लागू होता है। जिसका काम कानून व्यवस्था पर नियंत्रण करना है मुद्दे को सिलसिले से समझते हैं।
 बिलासपुर में खेल संगठनों का लंबा इतिहास है, खेल की अधकचरी जानकारी रखने वाले ने अपंजीकृत संगठनों का निर्माण किया अपने संगठनों को ना तो किसी का एप्लीकेशन दिलाया ना ही पंजीयन कराया। पर पदक, प्रशंसा प्रमाण पत्र और अपंजीकृत संगठन में पद खूब बांटे। ऐसे लोग जिन्हें अपने चार पहिया वाहन में बड़ी तख्ती और पदनाम लिखने का शौक है। वे इन पदों को योग्यता से नहीं द्रव्य से प्राप्त करते हैं। तभी तो बिलासपुर में कई खेल संगठनों के राष्ट्रीय संयोजक तक घूमते देखे जा सकते हैं। पूरे साल में एक दो कार्यक्रम और गोद में बैठने वाली मीडिया को मुंह में दो कौर। कार्यक्रम की सफलता बन जाती है, नुकसान खेल का ही नहीं प्रतिभाओं का भी होता है उनके प्रमाण पत्र किसी प्रकार की वैधानिक मान्यता नहीं रखते नुकसान दूरगामी होता है।
छत्तीसगढ़ के युवा खेल के असली स्थान तक पहुंच ही नहीं पाते कई बार तो बड़ी ठगी का शिकार हो जाते हैं ऐसे संगठन का धंधा ज्यादा दिन नहीं चलता लिहाजा संगठन के परजीवी अपने वसूली अभियान के लिए पत्रकारिता की छतरी खोलते हैं। पैसा सड़क पर बिखरा पड़ा है उठाने के लिए हाथ चाहिए। झोलाछाप डॉक्टर, कबाड़ी, बिजली चोर, सट्टा, गांजा, दारू के अड्डे रोज कमाई का बढ़िया साधन है। वसूली गैंग में यदि महिला है तो करेला नीम चढ़ा। साम, दाम, दंड, भेद काला अक्षर भैंस बराबर आईडी लगा दी और पैसा खड़ा है। ज्यादा हुआ तो बीपीएल कार्ड के आधार पर आरटीआई के सैकड़ो आवेदन,₹10 की लागत से 10000 कमाने का टोटका ऐसे कुकुरमुत्ते टाइप खबरचियों की खाकी से दोस्ती बहुत गहरी होती है। क्षेत्र की पुलिस अच्छे लिखने वाले को भले न पहचाने आईडी लेकर पूछने वाले को जरूर पहचानती है। खबर लिखने का दाम अलग ना लिखने का उनसे डेढ़ गुना। जीवन काल लंबा नहीं होता पर पैसे को स्थाई नुकसान पहुंचा रहा है यही कारण है कि शहर से लेकर ग्रामीण थाने तक पत्रकारों के खिलाफ वसूली की एफआईआर बढ़ गई है। मस्तूरी, पचपेड़ी, बिल्हा, सिरगिट्टी जहां जहां कच्चे धंधे की कमाई ज्यादा है वहां कर खरीद कर उसकी ईएमआई चुकाने का दबाव क्षेत्र के थाने पर डाला जाता है। यही कारण है की जनसुनवाई जैसे संवेदनशील मामलों में भी तथ्यात्मक समाचारों की कमी अभी हाल ही में देखी गई, जबकि कुछ माह पूर्व जब तखतपुर क्षेत्र के एक कोलवासरी की जनसुनवाई थी तो मुद्दे वैज्ञानिक थे इस बार मुद्दे कॉपी पेस्ट किया जा रहे थे। सवाल है कि खराब मुद्रा को नियंत्रित कौन करेगा हमें अपनी कार्यक्षेत्र में स्वयं ही बड़ा करना होगा यदि हम घटनास्थल पर नहीं जाते तो जो जाता है उसी को सत्य मान लिया जाता है।