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जमानत खारिज के बाद भी नहीं बदली भाषा, नितिन लॉरेंस की हरकतों से मसीही समाज शर्मसार

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रायपुर/बिलासपुर, 12 जुलाई 2025।
एक ओर देशभर में मसीही समाज की पहचान शिक्षित, सुसंस्कृत और शांति प्रिय समुदाय के रूप में स्थापित है, वहीं दूसरी ओर रायपुर से आई हालिया घटनाएं इस छवि को गहरा आघात पहुँचा रही हैं।
सत्र न्यायालय द्वारा नितिन लॉरेंस, रूपिका लॉरेंस और जयदीप रॉबिंसन की जमानत याचिका दिनांक 9 जुलाई 2025 को खारिज कर दी गई। आरोप गंभीर हैं। साजिश, धोखाधड़ी, और संस्थागत दुरुपयोग जैसे विषयों पर न्यायालय ने प्रथम दृष्टया संलिप्तता मानी है।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस न्यायिक फटकार के बाद आत्मचिंतन या पश्चाताप की अपेक्षा रखने के बजाय नितिन लॉरेंस ने अपने सोशल मीडिया पर जिस प्रकार की अशोभनीय और टपोरी भाषा में वीडियो व संदेश साझा किए हैं, वह न केवल न्याय प्रक्रिया का उपहास है, बल्कि मसीही समाज की मर्यादा और संस्थाओं की गरिमा पर भी आघात है।
 “स्टाइल में जवाब मिलेगा…” जैसे शब्दों का प्रयोग और वीडियो में दिखने वाला आत्ममुग्ध, उकसाने वाला रवैया यह दर्शाता है कि नितिन लॉरेंस को न तो न्यायिक संस्थाओं का भय है, न समाज की भावना का आदर।
इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी रूपिका लॉरेंस के साथ तमाम ग्लैमरस फोटो भी अपलोड की मानो बेल खारिज नहीं हुई, बल्कि कोई पुरस्कार जीत लिया हो। इस प्रकार का लम्पट प्रदर्शन न्याय व्यवस्था, मसीही समाज, और विशेष रूप से सीएनआई जैसे सम्मानित धार्मिक-सामाजिक संस्थान की साख को नुकसान पहुंचाता है।
और हाँ, ढेर सारी पोज़ वाली फोटो भी ठोंकी हैं जनाब ने!
कोई कहेगा “सत्र न्यायालय से बेल खारिज हुई है”, लेकिन इन्हें देखकर लगेगा मानो फैशन शूट से बाहर निकले हों!
अब सवाल ये उठता है क्या छत्तीसगढ़ पुलिस वाकई इनकी जेब में है, या फिर इनका “डर खत्म” होने का कारण कोई और डील है?
सीएनआई जैसे प्रतिष्ठित मसीही संस्थान का ये “स्वयंभू मैनेजर” अब टपोरी स्टाइल में बंटी-बबली की जोड़ी बनकर जब-तब मसीही समाज की साख पर कालिख पोत रहा है।
जहाँ एक ओर समाज खुद को मुख्यधारा में स्थापित करने की कोशिश में लगा है, वहीं नितिन लॉरेंस जैसे लोग उसे “लोकल ठेलों की भाषा” और “गली-मुहल्ले की शोखी” में डुबो रहे हैं।
सीएनआई चर्च, जिसकी नींव विनम्रता, सेवा और सत्य पर टिकी है, उसके एक कथित “मैनेजर” द्वारा इस प्रकार की व्यवहार शैली न केवल संस्थान की साख को धूमिल करती है, बल्कि समाज के युवाओं के लिए भी एक गलत उदाहरण प्रस्तुत करती है।
इस पूरे प्रकरण पर मसीही समाज के वरिष्ठों, पादरियों, और संस्थागत नेतृत्व को अब चुप नहीं रहना चाहिए। यदि इस प्रकार की लज्जाजनक हरकतों पर सामाजिक और धार्मिक स्तर पर सार्वजनिक असहमति नहीं जताई गई, तो इससे न केवल सीएनआई की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगेंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ी को यह संदेश जाएगा कि धोखा, दिखावा और घमंड भी सेवा का हिस्सा हो सकता है।
“सत्य की रक्षा केवल न्यायालय से नहीं, समाज की आत्मा से होती है। अब समय है कि चर्च नेतृत्व खुलकर कहे यह हमारे मूल्य नहीं हैं।”