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सत्ता जिसकी ताकत को ये बांटना नहीं चाहते, लोकतंत्र की उल्टी चाल

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बिलासपुर, 17 जून 2025। 
सत्ता वर्चस्व चाहती है वर्चस्व एक ऐसी ताकत है जो बाटी न जाए और जब सत्ता पोंगापंथीयो के पास आती है तो वह शिकायत का हर रास्ता बंद करती है। हर समाज की अपनी एक मनु स्मृति है। सत्ता के शिखर पर जब एकांगी सोच बैठती है तो यह सोच ऊपर से नीच तक गति करती है। 11 जून के छत्तीसगढ़ अखबार का संपादकी और उसके बाद छत्तीसगढ़ ईसाई समाज के जागरूक सदस्य द्वारा हमें भेजा गया एक स्क्रीनशॉट को मिलाकर यह समझ आया कि समाज में बदलाव और प्रगतिशीलता के खिलाफ सुनियोजित तरह से वे ही ताकते काम कर रही है जिनके पास सत्ता है। 
सामाजिक बहिष्कार के खासे चालन वाले साहू समाज के एक बजुर्ग ने पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली और दबाव डालने वालों का नाम भी लिख दिया। बुजुर्ग पर उनके समाज का दबाव इस हद तक था कि फसल काटने को मजदूर नहीं मिलते थे। पोती की शादी के गांव छोड़ना पड़ा। यह अकेला मामला नहीं है। प्रोफेसर धनाराम साहू ने अपने समाज के लोगों के बनाएं हुए नियमों के खिलाफ शिकायत की थी। अंतरजातीय विवाह पर जात बाहर करना तो मौलिक अधिकार के ही खिलाफ है। एक समय था जब अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने नगद इनाम मिलता था। प्रशस्ति पत्र मिलता था। प्रोफेसर साहू ने छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ के विवादास्पद नियमों की शिकायत कि समाज का नियमावली में लिखा है अंतर धर्म, अंतर जाति विवाह जो माता-पिता या पालक द्वारा आयोजित न कराया जाता है वह समाज की मुख्य धारा से पृथक माना जाएगा । साहू संघ में 2016 यह नियमावली चली आ रही है। छत्तीसगढ़ में जिस जाति में जाति पंचायत या किसी दूसरे नाम से सामाजिक संगठन जितने अधिक दकियानूसी और आक्रामक है उसके लोग उतने ही अधिक धर्मांतरण कर रहे हैं, और दूसरी ओर एक युद्ध धर्मांतरण के विरुद्ध जैसे श्लोगन लगाकर कुछ संगठन बैठके कर रहे हैं। ऐसी बैठकों मे नेतृत्व की जिम्मेदारी पूर्व सांसद भी निभाते हैं। ऐसी एक बैठक में शामिल होना हाल ही में बिलासपुर में भोपाल की पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर आई थी। 
अब ईसाई समाज की बात एक समय इन्हें प्रगतिशील, वैज्ञानिक सोच वाला, सेवा, मानवता, त्याग की मिशाल माना जाता था पर क्या अब ऐसा है। छत्तीसगढ़ में ईसाई समाज की एक प्रतिनिधि संस्था छत्तीसगढ़ डायोसिस अपंजीकृत है। इसमें वर्तमान पदाधिकारीयों के खिलाफ समाज के ही कुछ सदस्य कई मामले उठाते हैं और व्यवस्था अनुसार शिकायत करने हर उसे मंच पर जाते हैं जहां संभव हो। थाना, कोर्ट, जिला प्रशासन और अपनी आंतरिक व्यवस्थाम भी, पर जिनके हाथ में अभी डायोसिस की कमान है वे सदस्यों को हर तरीके से चमकते हैं। यहां तक की दर्जनों ऐसे लोगों को हम जानते हैं, जिन्हें समाज से पृथक कर दिया गया। उनके खिलाफ मुकदमे दायर करा दिए। ताजा उदाहरण तिल्दा थोमा चर्च जिला रायपुर का है। चर्च के पास्टर की शिकायत पर डायोसिस की बिशप और उनके साथीयों के खिलाफ गंभीर धारा में एफआईआर हुई बदले में डायोसिस ने बताते हैं अपने राजनीतिक संपर्कों का प्रभाव इस्तेमाल करते हुए पास्टर के खिलाफ एफआईआर कराई। राज्य के विभिन्न चर्च में इन दोनों बाइबिल की सूक्ति से ज्यादा कोर्ट के नोटिस लगे नजर आते है। यहां पर स्थित और भी विकेट है क्योंकि ऐसे ही लोगों के पास शिक्षण संस्थाओं का संचालन भी है। कल्पना करें ऐसे पदाधिकारी जिनके मस्तिष्क में सोच से ज्यादा विष है। हमारे बच्चों को क्या खुले और प्रगतिशील विचार देंगे। कट्टरपंथी ताकतें हर जाति, धर्म में हाबी हो रही है इसके पास सत्ता का चाबुक है। वर्चस्व ताकत जिसे न बाटनि रीति है। जब कभी-भी कोई शिकायतकर्ता उठे तो ये कहते है। शिकायत वह करें जिसे कभी कोई पाप नहीं किया जिसकी जिंदगी दूध की धोई हो जैसे दूध अब धोबी हो गया हो।