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देश में शुरू होगा नया वर्ग संघर्ष 1 मई पर विशेष
24 HNBC. बिलासपुर
बिलासपुर। 1 मई को फिर से श्रमिक दिवस होगा भारत में इसे मनाने की शुरुआत 1923 से हुई वैसे इसे विश्व के 80 देशों ने मनाने की शुरुआत 1889 पेरिस में हुई । तब अंतर्राष्ट्रीय महासभा में एक प्रस्ताव पास हुआ था जिसे 80 देशों ने माना असल में मजदूरों ने 1886 में काम के घंटों को लेकर प्रदर्शन किया प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षाकर्मियों ने लाठीचार्ज के बाद गोली चला दी, और प्रदर्शनकारियों में से एक ने बम पटक दिया। न्यायालय की कार्यवाही में उसे सरेआम फांसी की सजा हुई। बाद में इसी दिन से 1 मई को श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। 2021 में दूसरा अवसर है जब 1 मई को लॉकडाउन के बीच श्रमिक दिवस आएगा। स्वतंत्र भारत में लोक कल्याणकारी सरकार की अवधारणा के कारण श्रमिकों के पक्ष में एक-एक करके बहुत से कानून बने और उद्योगपतियों के चंगुल में मजदूर पीस ना जाएं इस बात का पूरा ख्याल रखा गया। खुली अर्थव्यवस्था विदेशी विनिवेश को बढ़ाना जैसे आधारों पर धीरे-धीरे श्रमिक कानूनों को खत्म करने की रणनीति बनने लगी ऐसा माना गया कि श्रमिक कानून के कारण विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में आना नहीं चाहती हैं हद तो तब हो गई जब 2020 के लॉक डाउन के बाद में अर्थव्यवस्था को सुधारने के नाम पर भाजपा शासित राज्यों ने श्रमिक कल्याण के कानूनों को समाप्त कर दिया। पहले इन कानूनों की संख्या 35 से अधिक थी और एक झटके में ही 30 से अधिक कानून समाप्त कर दिए गए हैं। काम की अवधि 8 से बढ़ाकर 12 घंटे कर दी गई है अब दुकाने 6:00 से 12:00 बजे रात तक खोली जा सकती हैं पूर्व में यह 8:00 से 10:00 रात्रि तक थी पहले काम का हिसाब रखने के लिए 61 रजिस्टर और 13 रिटर्न दाखिल करने होते थे अब मात्र एक रजिस्टर और एक रिटर्न दाखिल करना होता है पहले ठेका श्रमिक को 20 लेबर रखने पर भी पंजीयन कराना होता था की संख्या बढ़ाकर 50 कर दी गई हैै। इसका सीधा सा असर उद्योगों पर हुआ और उन्हें 50 लेवर तक रखकर काम कराने पर पंजीयन की जरूरत ही समाप्त हो गई है पूरे नियम इस तरह बनाए गए कि कारखानों मेंं श्रमिक यूनियन गठित नहींं हो भाजपा शासित सरकारोंं के इस श्रमिक विरोधी नीति का विरोध तो आर एस एस के अनुषांगिक संगठन बीएमएस ने भी किया देश के भीतर इन दिनों जो स्थिति है इसमेंं उद्योगोंं को बचाना अच्छी बात है किंतु उद्योयोग बचाने के लिए मजदूरोंं का बलिदान कैसे उचित है। देश में एक पक्ष यह कहते नहीं थकता की मीडिया मिडिल क्लास की आवाज उठाता है अभी हाल का ही आंकड़ा है कि देश में 10 करोड़ वाले मध्ययम वर्ग की संख्या घटकर 7 करोड़ हो गई है। अर्थात 3 करोड़ लोगोंं की खर्च की क्षमता इतनी घटी कि वे मध्यमवर्ग से बाहर हो गए असल में मजदूर केवल वह नहींं है जो निर्माण कार्यों मैं लगा है या कारखाने में लगा है नई परिस्थितियों में खेत पर काम करने वाला भी मजदूर ही है यही कारण है कि 1 मई के लिए किसान आंदोलन ने किसानों और मजदूरोंं को एक दर्जे पर रखते हुए नए तरीके से मई दिवस मनाने की बात कही अभी बाजार की स्थितियां और तेजी से खराब होंगी देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है ऐसे में केवल पूंजी पतियों के संरक्षण की नीतियां समाज में वर्ग संघर्ष को बढ़ा देगी मजदूर वर्ग को प्रति माह चावल और चना उद्योगपतियों को करोड़ों के कैश पैकेज इससे तो नए तरह का वर्ग संघर्ष शुरू होना ही है भले ही इसे कोई लाल सलाम का नाम दे दे।