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नागरिकों का भरोसा उठ रहा है, अब व्यवस्था पर से

लॉकडाउन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा

24 HNBC. बिलासपुर

बिलासपुर मे लॉकडाउन का आदेश हुए आज 11 दिन है । इस बात का पूरा भरोसा है कि 26 को खत्म होने वाला यह लॉकडाउन अब लंबा खींचने वाला है। आज 2:00 बजे के बाद कभी भी इसके एक्सटेंशन का आदेश आ जाएगा लोकतंत्र में जब कभी भी ऐसी कठिन परिस्थितियां आती है जैसे अभी है तब जनप्रतिनिधियों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है किंतु यह लॉकडाउन इस परंपरा को भी खंडित कर रहा है। देश के साथ प्रदेश में भी त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था है और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की संसद से लेकर विधानसभा फिर जिला पंचायत, नगर पंचायत, नगर निगम, जनपद और ग्राम पंचायत तक पायदान दर पायदान लंबी व्यवस्था है। इसे ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर कैसे भी समझा जा सकता है। जब कभी भी व्यवस्था और नागरिक किसी आपातकाल में फसते हैं तो इन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है किंतु इस बार ऐसा नहीं है निर्वाचित जनप्रतिनिधि स्वयं यह महसूस कर रहे हैं कि ब्यूरोक्रेसी जिसे नौकरशाही कहा जाता है इस बार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से राय मशवरा नहीं कर रही, और यह संकेत अच्छा नहीं है। आम नागरिकों को भी यह समझ आ रहा है कि कोविड-19 में सब अधिकार नौकरशाहों के पास केंद्रित हो रहे एक तरफ मध्यप्रदेश में जिले के प्रभारी मंत्री आपदा प्रबंधन की बैठकों में व्यक्तिगत रूप से अपने परिवार वाले जिले में उपस्थित हैं बैठक की अध्यक्षता कर रहे हैं उलट छत्तीसगढ़ में कम से कम बिलासपुर में हमने अपने प्रभारी मंत्री को कभी भी नहीं पाया निर्वाचित जनप्रतिनिधि भी नौकरशाहों के साथ सीधा वार्तालाप नहीं कर पा रहे हैं , प्रशासन सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट में नेगेटिव देखना पसंद कर रहा है शेष स्थानों पर उसे पॉजिटिव पॉजिटिव ही अच्छा लग रहा है किंतु हो उलट रहा है मेडिकल रिपोर्ट पर पॉजिटिव पॉजिटिव आ रहा है और खबरें नेगेटिव नेगेटिव आ रही है। किसी पत्रकार को या किसी भी मीडिया संस्थान को नकारात्मकता लिखना अच्छा नहीं लगता जिसे दबाने की कोशिश होती है वही तो लिखा जाता है और उसे खोज कर लिखना ही पत्रकारिता का उत्तरदायित्व है ऐसे में नकारात्मक खबरें यदि प्रशासन को बुरी लगती है तो मीडिया का दोष नहीं है कैसे दुरुस्त हो कोविड-19 की चेन को कैसे तोड़ा जाए टीकाकरण प्रभावी तरीके से कैसे लागू हो इन सब पर जनप्रतिनिधियों की अपनी राय है ऐसा माना जाता है कि माइक्रो प्रबंधन से ही कोविड पर असरकारक नियंत्रण हो सकता है और माइक्रो प्रबंधन में पंच से लेकर पार्षद तक के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की विशेष भूमिका है इन्हें शामिल किए बिना इस विपत्ति पर नियंत्रण कठिनतर होता जाएगा। लॉकडाउन के एक आदेश के बाद दूसरा आदेश फिर समय सीमा बढ़ाने का तीसरा आदेश आता रहेगा और परिस्थितियों नियंत्रण में नहीं आएंगी दोष किसे देंगे जवाबदेही ढूंढने कि कोशिशें होंगी तो उसे नकारात्मकता कहा जाएगा ऐसे में अच्छा होगा लोकतंत्र में नागरिकों ने जिन्हें अपना प्रतिनिधि चुना है उनकी भूमिका सक्रिय जाए। 

बिलासपुर में अब थोक व्यापार शुरू करना ही पड़ेगा ऐसे में यहां भी यदि रायपुर की तर्ज पर रात की पाली में 11:00 से 4:00 व्यापार विहार खुला तो इसे आसानी से हजम नहीं किया जा सकता। थोक व्यापार खुलेगा फुटकर व्यापार सिर्फ होम डिलीवरी से होगा बैंक की शाखाएं आम आदमी के लिए नहीं खुलेगी तब आम आदमी जिसके लिए यह तंत्र चल रहा है कहां जाएगा आज सैकड़ों ऐसे परिवार हैं जिनके परिवारिक सदस्य कोविड-19 से पीड़ित हैं और अस्पतालों में हैं परिवार को ऋण व्यवस्था पर निर्भर होना पड़ रहा है किंतु बैंक नहीं खुले हैं आम आदमी के लिए तो बिल्कुल ही नहीं खुले हैं ऐसे में नगद की व्यवस्था कैसे हो। जनप्रतिनिधि संवाद का वह माध्यम है जिसके द्वारा जनता की तकलीफ है प्रशासन तक पहुंचती है इसलिए बार-बार उनकी भूमिका को रेखांकित किया जा रहा है।