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बीजेपी और बाबा साहब एक साथ चल ही नहीं सकते, भाजपा की चले तो अंबेडकर को बना दे मूर्ति
- By 24hnbc --
- Tuesday, 11 Oct, 2022
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समाचार -
बिलासपुर, 12 अक्टूबर 2022 । भारत की राजनीति में सुविधाओं की राजनीति करने में भाजपा अव्वल है। नेताओं का पूरा नाम या उपनाम लेकर जब कभी भी वो राजनीतिक रोटी सेकी जाती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है और उसने आदेश जारी किया है कि बीआर अंबेडकर का पूरा नाम भीमराव रामजी अंबेडकर का ही उपयोग किया जाएगा। सवाल उठता है पूरे नाम की परंपरा अंबेडकर के लिए क्यों. ...? यदि यह सही है तो देश के यशस्वी प्रधानमंत्री का पूरा नाम नरेंद्र दामोदरदास मोदी क्यों उपयोग नहीं किया जा रहा। असल में अंबेडकर को विचारों से काटकर राम नाम युक्त मूर्ति बनाने का दौर भाजपा प्रारंभ करने जा रही है। ऐसे में अंबेडकर के विचार जो हिंदू समाज को सुधारने वाले हैं दफन हो जाएंगे, और अंबेडकर विचार ना होकर मूर्ति बन जाएंगे वैसे भी मूर्ति पूजा ही हमारे देश की थाती बन गई है । आरएसएस के हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के प्रोजेक्ट में अगर कोई बौद्धिक बाधा है तो वह अंबेडकर के विचार हैं, और आरएसएस और उनमें से जुड़े तमाम संगठन अंबेडकर के विचारों को हटाकर उन्हें देवता बनाने का अभियान चला रहे हैं। याद रखें गौतम बुद्ध के साथ ऐसा हो चुका है । वे मूर्ति पूजा के खिलाफ थे और अंत में उन्हें मूर्ति बना दिया गया। 14 अक्टूबर 1956 नागपुर में 1000 -10000 नहीं 10000 - 20000 नहीं 380000 लोगों ने थोक में सनातन धर्म छोड़कर बौद्धिष्ट होना स्वीकार किया था और तभी बाबा साहब ने 22 प्रतिज्ञा भी कराई थी और यह 22 प्रतिज्ञाएं आरएसएस के साथ बीजेपी को कांटे के समान चुभती हैं। पर वोट की राजनीति अंबेडकर को भूलने नहीं देती यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए अंबेडकर और महात्मा गांधी दोनों मजबूरी हैं। हिंदुत्व के जन्मदाता अंग्रेजों से माफी मांगने के बाद सावरकर ने इसी नाम से किताब लिखी जो 1923 में सामने आई आरएसएस के पूज्य वीर सावरकर ने लिखा कि जिस देश में वर्ण व्यवस्था नहीं है उसे म्लैच्छ देश माना जाए यही नहीं दलितों और स्त्रियों को हर हाल में गुलाम बनाए रखने की समझ देने वाली मनु स्मृति को वेदों के बाद सबसे पवित्र ग्रंथ घोषित करते हुए सावरकर लिखते हैं यही ग्रंथ सदियों से हमारे राष्ट्र की एहीक एवं पारलौकिक यात्रा का नियमन कराता आया है आज भी मनु स्मृति ही हिंदू नियम है वही मूल है। डॉक्टर अंबेडकर ने वर्ण व्यवस्था और जाति उत्पीड़न को लेकर हिंदू धर्म की तीखी आलोचना की है सनातन धर्मवादियों ने इसके लिए उनकी निंदा की चुनावी राजनीति में विजय पा लेने के बाद भी बीजेपी इस वैचारिक अभियान की काट नहीं ढूंढ पाई।


