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दिमाग की विकृति, निकल रही धूल पर

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बिलासपुर, 11 फरवरी 2026। 
यदि इसे कला नहीं माने तो यह समाज के अंदर फैली मानसिक बीमारी है। जिसका चित्रण विक्षिप्त दिमाग यहां वहां करता रहता है। पहले ऐसे पॉर्न रेलवे बोगी के बाथरूम में बहुतायत से मिलते थे। कुछ स्कूलों के प्रशाधन भीतर भी इस तरह के चित्रण मिलते हैं। 
अब मूल बाद आखिर यह विकृति दूर क्यों नहीं हो रही है। बल्कि कुछ लोगों ने तो इसका व्यावसायीकरण करके पैसा कमाना प्रारंभ कर दिया। एक समय लुका छुपी के साथ पढ़ा जाने वाला मस्तराम अब हथेली में उपलब्ध है। हमारा मोबाइल, हमारे मोबाइल पर एक बार इस तरह का एक शब्द लिखा जाए तो दिनभर सर्च इंजन हमको बार-बार परोसता रहता है। बच्चों का क्या कहें हर आयु वर्ग के पाठक जिन्हें इच्छा है इसे देखते, सुनते और पढ़ते हैं। अश्लील जोक जो कभी कुछ जग कहे और सुने जाते थे अब एप के माध्यम से शॉर्ट पर उपलब्ध है। सीधा अर्थ है डिमांड है तो सप्लाई है इस रियल कहे या रियलिटी संसद के भीतर से लेकर सड़क तक पर यह बिछी पड़ी है। समाचार के साथ जो फोटो लगाई गई है वह विद्या नगर बिलासपुर गली नंबर 2 के भीतर खड़ी एक कार पर रोज हो रही कलाकारी की है। धूल पर कभी इन इंद्रियों की संरचना ना तो पुरुष को छोड़ता है ना महिला को। कुछ माह पूर्व बीबीसी से एक समाचार प्रकाशित हुआ था जिसमें ग्वालियर कि घटना से प्रेरित होकर वहां के युवाओं ने दीवार में हो रहे ऐसे भद्दे अश्लील, यौन हिंसा को बढ़ावा देने वाले चित्रांकन को हटाया और उन पर कुछ अच्छे सकारात्मक प्रसन्नता देने वाले चित्रांकन लगाएं। हम समाज के हर दुर्गुण को ठीक करने की जिम्मेदारी व्यवस्था पर नहीं डाल सकते सो हमें मनोवैज्ञानिक स्तर पर रचनात्मक काम खुद ही करने होंगे।