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हे राम से जय श्री राम का सफर, लोकतंत्र और कानून दोनों की हो रही हत्या
- By 24hnbc --
- Sunday, 16 Apr, 2023
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समाचार -
बिलासपुर, 17 अप्रैल 2023। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि 15 अगस्त 1947 के दिन जब हमें आजादी प्राप्त हुई थी तब हमने लोकतंत्र के साथ कुछ प्रतिज्ञाएं भी की थी प्रतिज्ञाओं पर पहला हमला 30 जनवरी 1948 को हुआ जब एक विचारधारा के प्रतीक नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को तब गोली मारी जब वे बिरला हाउस में प्रार्थना सभा में जा रहे थे। हत्यारे की गोली लगने के बाद उनके अंतिम शब्द थे हे राम अब 15 अप्रैल 2023 प्रयागराज मेडिकल कॉलेज के बाहर एक अपराधी को तीन युवक गोली मारते हैं और मारने के बाद नारा लगाते हैं जय श्री राम क्या हमारा स्वाधीनता का सफर हे राम से जय श्री राम के बीच चला है। हम कल्पना नहीं कर रहे हैं हकीकत है लोकलुभावन न्याय का परिणाम यही होना है कभी प्रभु की मर्जी, कभी कर्मदंड, कभी जैसे को तैसा के नाम पर हमने हमारी शासन की ताकतों ने सत्ता प्राप्ति के जो रास्ते निकाले उन्हीं का परिणाम है कि हमारा मिलिशिया की ओर तेजी से बढ़ा है। महात्मा गांधी के हत्या के प्रकरण को देखें तीन अभियुक्तों को आजीवन कारावास 2 को फांसी फिर मामला आता है प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का आवास पर ही दो सुरक्षा गार्ड बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने सुरक्षा के लिए मिले हथियार से अपने ही प्रधानमंत्री को गोली मारी हत्या का अभियोग लगा दोनों को फांसी हुई। तीसरा मामला पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हुई 6 आरोपियों को उम्र कैद की सजा हुई बाद में छयो आरोपी जेल से रिहा किए गए क्या इसे हम अपने न्याय शास्त्र का बदलता स्वरूप कह सकते हैं। और अब हम तत्काल न्याय के दरवाजे पे जिस तरह हम खड़े हैं उसमें अपराधी विकास दुबे का एनकाउंटर और आंध्र में बलात्कारियों को गिरफ्तारी के बाद घटनास्थल पर मारने का नाटक किसे और किस दृष्टिकोण से जायज ठहराने का प्रयास करेंगे यदि तत्काल न्याय चाहे वह पुलिस करें या कोई अन्य अपराधी कर दे यदि यही सही है तो गुजरात में एक महिला के साथ बलात्कार उसके परिवार के सदस्यों की हत्या के आरोपियों को सजा खत्म होने के पूर्व ही माफी को आप क्या कहेंगे। कभी हमारी सत्ता बलात्कार हत्या के सजायाफ्ता को माफ कर देती है कभी बिना मुकदमा चलाए पुलिस गोली मार देती है तो कभी इसी देश का नागरिक जय श्रीराम के नारे के साथ गोली मार देता है हम और हमारे वर्तमान हुक्ममराम स्वयं को विश्व गुरु घोषित करते थकते नहीं हैं और विश्व गुरु का न्याय शास्त्र, दंड विधान किस दिशा में जा रहा है इस पर विचार ही नहीं करते।


