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देश के किसी भी कोने में मसीही अचल संपत्ति का कस्टोडियन तो आरबीआई ही है

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बिलासपुर, 12 मार्च 2026। 
भारत में ईसाई समाज की गतिविधियां बहुत पुरानी है और ये गतिविधियां केवल ब्रिटेन के कारण नहीं अमेरिका, पुर्तगाल, जर्मन, फ्रांस से भी आई है और संचालित भी हुई है। जब 1947 में देश स्वतंत्र हुआ उसे समय से ही मूल ईसाई संगठनों और व्यक्तियों ने यहां से हटना प्रारंभ कर दिया। वे नागरिक प्रशासन और बैंकिंग के गहरे जानकारी थे। सत्ता और सृष्टि वर्ग (कुलीन), अभिजात्य वर्ग के संस्कृति से परिचित थे। उन्होंने भारतीय संरचनाओं के हाथ में संपत्तियों की देखभाल को छोड़ी पर चाबी अपने पास रखी और एक बड़ा काम उन्होंने देश के कोने-कोने में फैली हुई अचल संपत्तियों का कस्टोडियन रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया को बनाया। सीएनआई, सीएनआईटीए, यूसीएमएस, सीडब्ल्यूबीएम या कोई भी संस्था चर्च, अस्पताल, स्कूल को संचालित करें पर उसकी मालिक तो नहीं हो सकते। वह उसे ना बेज सकती है ना लीज पर दे सकती है।
हम यह बात किसी सुनी सुनाई बात के आधार पर नहीं लिख रहे हैं। जबलपुर डायोसिस के बिशप जोनाथन ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद बिलासपुर स्थित एक संपत्ति उसे समय के प्रतिष्ठित नागरिक राय साहब बनवारी लाल को विक्रय की तब उन्होंने रुपए ₹ 350000 अदा करके आरबीआई से उन कागजों की प्रमाणित प्रति ली जिसका कस्टोडियन रिजर्व बैंक आफ इंडिया है। सीएनआई का गठन 29 नवंबर 1970 में हुआ और वर्ष 2013 में देश के सर्वोच्च अदालत ने इनमें अन्य संस्थाओं के मर्जन को विधि शून्य घोषित किया। इतना ही नहीं सीएनआई की वैधता भी खत्म कर दी। पूरे देश में ईसाई समाज की संपत्तियों के स्वरूप का बदलाव 1970 के बाद ही हुआ है। आरबीआई के उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि कौन सी अचल संपत्ति पर कौन सी गतिविधि संचालित है। स्कूल, अस्पताल, बांग्ला, विधवा आश्रम, कर्मचारी निवास, चर्च, कब्रिस्तान, नजूल, रजिस्ट्री (निजी) खेती सब कुछ लिखा है। भूमि का माप, व्यवस्था अनुसार बी1 पी2 संलग्न है। ऐसे में विभिन्न अदालत में कोई भी संपत्ति संबंधी नामांतरण लीज नवीनीकरण का प्रकरण जिसमें भी आरबीआई को पक्ष कार्य नहीं बनाया गया और निर्णय पारित कराए गए ये काम तथ्यों को छुपा कर कराए गए।
देश की प्रशासनिक व्यवस्था को संचालित करने वाला वर्ग आईएएस जहां ट्रेनिंग पता है अर्थात मंसूरी (उत्तराखंड) की ईसाई समाज की संपत्तियां भी आरबीआई के दस्तावेजों में शामिल है। एक समय तो वह भी था जब भूमि राजस्व संबंधी प्रशिक्षण सत्रों में प्रशासनिक अकादमी में इसाई समितियों की संपत्तियों पर कैसा व्यवहार किया जाएगा का अध्ययन भी कराया जाता था।