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अभी सर्वाधिक प्रासंगिक हैं अंबेडकर, क्योंकि इतने खतरे में कभी नहीं रहा संविधान

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समाचार -
बिलासपुर, 12 अप्रैल 2023। 1995 में जब मैंने विश्वविद्यालय के समक्ष पीएचडी रजिस्ट्रेशन के लिए डॉक्टर अंबेडकर का समाज एवं धर्म दर्शन शीर्षक प्रस्तुत किया तब इंटरव्यू कमेटी ने कहा कौन जानता है कैसे सिद्ध करोगे कि डॉक्टर अंबेडकर का धर्म दर्शन क्या है उस कमेटी में दर्शनशास्त्र विभाग के एक प्रोफेसर, एक प्रोफेसर अंग्रेजी साहित्य के और एक इतिहास विभाग के थे। मुझे पूरा आधा घंटे लगा कमेटी को इस बात के लिए तैयार करने में की इस शीर्षक ने और डॉक्टर अंबेडकर के धर्म-दर्शन का भारतीय समाज पर प्रभाव एक शोध का उचित विषय है। उन दिनों मध्यप्रदेश के महू में डॉ अंबेडकर पर एक शोध पीठ प्रारंभ हुई थी जिसने बाद में बड़ा रूप ले लिया पिछले दो दशक के पहले उत्तर भारत में भी डॉ आंबेडकर की फोटो, मूर्ति, कैलेंडर खोजने पर ही मिलती थी । संविधान निर्माता के रूप में उनके योगदान पर कोई चर्चा भी नहीं करता था राजनीतिक स्थितियां बदली और अब देश में कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जो अंबेडकर के नाम लिए बिना अपनी राजनीति कर सकें। भारतीय जनता पार्टी के लिए डॉक्टर अंबेडकर दो धारी तलवार हैं। डॉक्टर अंबेडकर का प्रथम उद्देश्य था जाति प्रथा का उन्मूलन जाति नष्ट करने के लिए ही उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया और अंत में बौद्ध धर्म अपनाया। वे ना तो इस्लाम धर्म से आकृष्ट ना ही ईसाई धर्म से संतुष्ट, सिख धर्म ने उन्हें प्रभावित किया था पर कुछ कारण रहे वे उससे भी दूर हो गए। भारतीय इतिहास में 14 अक्टूबर 1956 स्थान नागपुर जहां उन्होंने अपने लाखों चाहने वालों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया और सब ने 22 प्रतिज्ञा की अंबेडकर मानते थे हिंदू धर्म ही भेदभाव का स्रोत है इसलिए सुधार से काम नहीं चलेगा और इसे छोड़ना ही एकमात्र विकल्प है ऐसे अंबेडकर को भारतीय जनता पार्टी कैसे पचा सकती है। इस बात पर विचार जरूरी है कि अंबेडकर के अनुयायियों ने क्या उनके बताए रास्ते पर चला है। अंबेडकर वादियों का सामाजिक बर्ताव वैसा ही है जैसा अन्य जगहों पर है पुरुष अपने महिलाओं के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसे अन्य समाज में करते हैं। 14 अक्टूबर को अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाकर जाति विहीन समाज की शुरुआत की तो कितनों ने जाति का विनाश किया। शादी विवाह तो जाति में ही हो रहे हैं, वोट तो जाति को देखकर हीं करते हैं क्या समझे जातिवाद बढ़ा या घटा, जातीय चेतना पहले से अधिक हो गई क्योंकि अधिकार के प्रति पहले से ज्यादा सचेत हो गए जानते हैं संख्या बल से राजनीतिक ताकत मिलती है तभी तो इसे हथियार बना लेते हैं। भले ही मंच पर यह ना दिखाई दे लेकिन व्यवहार में तो खूब हो रहा है जब जिसे अपनाने में लाभ दिखाई देता है अपना लिया जाता है किसी का अपमान हो गया तो वह ओबीसी हो गया और यदि उसकी हत्या हो गई तो वह हिंदू हो गया जैसी सुविधा हुई वैसा आटा सेख लिया। क्या मूर्तियां लगा लेने से विचार खेलेगा बगैर मूर्ति लगाए भी धर्म का प्रचार खूब किया जा सकता है इस्लाम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। डॉक्टर अंबेडकर आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी हैं एक राजनीतिक दल इस बात को बखूबी जाने का है इसलिए वह अपनी विचारधारा को स्थापित करने के लिए सबसे पहले हमारे संविधान पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता है पहले तो ऐसा काम केवल नेता करते थे अब तो संवैधानिक पद पर बैठकर किया जा रहा है ऐसे में 14 अप्रैल केवल मूर्ति पर माला पहनाने के लिए नहीं गंभीर विचार विमर्श के लिए शुरुआत होनी चाहिए।