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संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिकरण, परिणाम भोगेगी जनता

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। रेप को लेकर जिस तेजी से हमारे देश के वाशिंदों और हुक्मरानों की सोच बदली है या सुविधा परस्त हुई है, उसे लेकर कोई शोधार्थी चाहे तो डिलीट और पीएचडी की जा सकती है। हम केवल गुजरात के बिल्किस मामले की चर्चा नहीं करेंगे। दो और अन्य मामले को भी जाने ।10 सितंबर 2013 दिल्ली निर्भया कांड चार आरोपियों को दिया गया मृत्युदंड। 6 दिसंबर 2019 बेंगलुरु हैदराबाद नेशनल हाईवे पर हुआ एक बलात्कार जिसमें 27 नवंबर 2019 को पुलिस ने घटना स्थल की जांच के वक्त वहीं पुलिस कस्टडी में उपस्थित चार आरोपियों को मार दिया। इन तीनों को अलग-अलग संदर्भों में एक साथ समझे 2013 आज जो सत्ता में बैठे हैं वे जो लोग हैं जो बलात्कार जैसे अपराधों के लिए कठोर दंड की बात करते हैं मृत्युदंड की मांग करते हैं और ऐसे अपराधियों को क्षमा भी यही करते हैं। 14 अगस्त 2022 बिल्किस बलात्कार मर्डर के 11 आरोपी माफ कर दिए गए ऐसे में प्रश्न उठता है कि 2013 निर्भया केस 4 को मृत्युदंड दिया गया यदि आजीवन कारावास दिया होता तो जिस नियम नीति के चलते गुजरात से 11 माफी पाए वही माफी इन्हें भी मिलती क्या अपहरण के बाद सुधर जाने की गुंजाइश निर्भया के अपराधियों को नहीं थी ऐसे भेदभाव क्यों. ..? 6 दिसंबर बेंगलुरु हैदराबाद नेशनल पर तेलंगाना पुलिस ने वेटरनरी डॉक्टर के रेप और मर्डर में पकड़े गए आरोपियों को गोली मार दी कांड के बाद पुलिस अधिकारियों का जोरदार स्वागत हुआ। गनीमत है एफआईआर दर्ज हुई थी अन्यथा पिक्चर वाली पुलिस का सीन बनता नो एफआईआर नो इन्वेस्टिगेशन डिसीजन ऑन द स्पॉट अब यहां तो मामला कोर्ट तक गया ही नहीं और पुलिस ने ही अपने स्तर पर हत्या कर दी, जिसे जनता न्याय कह रही है यही है लोकलुभावन कानून के नुकसान. ...।
 आखिर रेप होता क्या है। यह आम अपराध से हटकर है यह सेक्सुअल प्लेजर नहीं है रेप बदले की भावना कम्युनिटी के खिलाफ किया गया अपराध एक ऐसा अपराध जिसमें महिला के शरीर पर आने जाने में यातना नहीं दी जाती अपराधी को परिणाम पता होते हैं माफी तार्किक होनी चाहिए अपराधी को आत्मग्लानि होना चाहिए और माफ़ कौन करेगा जिस पर बीती वो या अन्य बिल्किश मामले में जिन्हें फांसी मिली उनके अधिवक्ता ने एक रिट पिटिशन आर्टिकल 32 के अंतर्गत पेश की थी 5 जज की बेंच बाला निर्णय पर 2 जज की बेंच ने सुनवाई कैसे कर दी, बिलकिस बानो के साथ यह घटना 3 मार्च 2002 को हुई सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच हुई ऐसे में कानून रतन सिंह विरुद्ध श्रीहरण में स्पष्ट कहा गया है कि केंद्र की राय आवश्यक है क्योंकि जांच की एजेंसी सीबीआई है। आरोपियों की वकील लालाजी एसएलपी में नहीं गए वह रिट पिटिशन में गए सुप्रीम कोर्ट से तथ्य छुपा कर निर्देश ले लिया कि जब अपराध घटित हुआ उस समय माफी पॉलिसी 1992 चल रही थी लिहाजा माफी पालिसी 2014 को छोड़कर 1992 के अनुसार प्रकरण सुन लिया जाए पूरा मामला सत्ता धिस की सुविधा से बनता बिगड़ता है संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिकरण का परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है।