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जनादेश से गायब होती धर्मनिरपेक्षता, आशंका हो रही बलवती
- By 24hnbc --
- Sunday, 13 Mar, 2022
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। 1947 के बाद से देश की आवाम ने लोकसभा विधानसभा के कई चुनाव देखें। आते-आते अब यह दौर आ गया है कि जनादेश जो एक के लिए आशा का स्रोत है वह दूसरे के लिए आशंका का कारण है। मतदाताओं का एक वर्ग उसमें स्वयं को किसी भी तरह शामिल नहीं पाता इस नजरिए से यह जनादेश खंडित है। लोकप्रियता हिंसा में जनता और नेता की समान भागीदारी है। इसमें जनता का नेता के साथ अपनापन पैदा होने लगा लखीमपुर के चुनाव परिणाम इसी ओर इशारा करते हैं और यह पूरा तंत्र 2002 से प्रारंभ हुआ। 1984 में सिख दंगों के बाद कांग्रेस ने न जाने कितनी बार माफी मांगी वह दौर अलग था अब तो हिंसा के बाद चाहे वह हिंसा नेता ने की हो, नेता पुत्र ने की हो या जनता ने सब एक हो जाते हैं और यहीं से उभरता है एक ऐसा नेतृत्व जो हिंसा में जनता के साथ खड़ा है। मुद्दे बेरोजगारी, कुप्रबंधन, आर्थिक बदहाली का मतदान से कोई रिश्ता ही नहीं और यदि ये सब चीजें भाजपा के शासनकाल में हुई हो तब तो वाह भक्त जनता अवतारवाद की अंध समर्थक इन बातों से उसे सरोकार ही नहीं है। नोटबंदी जीएसटी के बाद भी उन्हीं के हाथों लाभार्थियों की फौज आस्था श्रद्धा का ऐसा मेल अपनी जनता में पहले असुरक्षा का भाव पैदा करना फिर स्वयं को उद्धार करता बताना और फिर हर चुनाव के पहले स्वयं का भी जान का खतरा बताना यह पुराना आजमाया हुआ फॉर्मूला है। असुरक्षा का भाव कौन पैदा करेगा, कितने साल में करेगा, किस-किस राज्य में करेगा सब का ब्लूप्रिंट पहले से तैयार है फिर ढिटाई के साथ 2002 आएगा क्रिया की प्रतिक्रिया करके लोकप्रियता हासिल की जाएगी हिंसा में जनता और उसके नेता की समान भागीदारी हो जाएगी हिंदू खतरे में है, हिंदू असुरक्षित है के भाव से एक ऐसी पार्टी चुनाव लड़ेगी जिसका निर्माण ही चुनाव जीतने के लिए हुआ है। आज हम अपने संविधान को केवल देख रहे हैं यदि पढ़ते तो पता रहता कि लोक कल्याणकारी, शासन , समाजवादी शासन उसके धेय वाक्य हैं तभी बैंक सरकारी होना जरूरी है, रेलवे सरकारी होना जरूरी है, रक्षा की उत्पादन इकाइयां सरकारी जरूरी है, किंतु हमने विगत दो दशक से अपने युवाओं को अन्य कामों में गुमराह कर रखा है उन्हें यह लगता है कि निजी करण हर हाल में जरूरी है और सड़क बने या ना बने गाड़ी ऐसी बने जिसके चलने मात्र से सड़क बन जाए तभी तो एसयूवी सड़क के किनारे खड़े लोगों को रौंद देती है और अपना मार्ग बना लेती है। देश में संविधान के मूल तत्व धर्मनिरपेक्षता गायब है और हम तेजी से हिंदू राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहे हैं इन सबके बावजूद ऐसे भी संस्थाएं हैं जो संविधान की आड़ में कट्टरवाद का आरोप लगाकर अब संविधान को ही बदलना चाह रही है नायक तेजी से बदले जा रहे हैं और डिजिटल दुनिया में ऐसी कहानियां फैलाई जाती है जिससे युवा वही समझता है जो उसे बताया जाता है ऐसे में जनादेश तो ऐसा आएगा ही जो एक के लिए आशा का स्रोत है वही दूसरे के लिए आशंका का कारण. ....।


