पत्रकार पहुंचा धरने पर पीआरओ के खिलाफ
मुंगेली 35 लाख का विज्ञापन विवाद अब पहुंचा " राजधानी "
- By 24hnbc --
- Tuesday, 06 Oct, 2026
24hnbc.com
मुंगेली, 7 अक्टूबर 2026।
मुंगेली जिले में पदस्थापना के दौरान तत्कालीन सहायक संचालक एवं जनसंपर्क अधिकारी पर लगे कथित वित्तीय अनियमितता व पत्रकारों के प्रति अमर्यादित टिप्पणियों के आरोपों का मामला अब गरमा गया है। विभिन्न प्रशासनिक व उच्च मंचों पर शिकायत दर्ज कराने के बाद भी निर्धारित समय-सीमा में ठोस कार्रवाई न होने से क्षुब्ध होकर मीडिया प्रतिनिधि खेमेश्वर पुरी गोस्वामी नवा रायपुर स्थित तूता धरना स्थल पर एकल अनशन पर बैठ गए हैं। धरना स्थल से उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी व्यक्तिगत विद्वेष के तहत नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के आत्मसम्मान, प्रशासनिक पारदर्शिता और विधि के शासन की रक्षा हेतु गांधीवादी व संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप उठाया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, जिला मुंगेली मीडिया प्रतिनिधियों द्वारा पूर्व में कलेक्टर कार्यालय के माध्यम से महामहिम राज्यपाल महोदय के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया था। ज्ञापन में आरोप लगाया गया था कि मुंगेली पदस्थापना के दौरान तत्कालीन जनसंपर्क अधिकारी द्वारा शासकीय विज्ञापनों एवं आयोजनों के नाम पर कथित रूप से सुनियोजित वित्तीय अनियमितताएं की गईं। इसके साथ ही स्थानांतरण के उपरांत एक कथित ऑडियो में जिले के पत्रकारों के विरुद्ध अमर्यादित, विद्वेषपूर्ण व मानहानिकारक टिप्पणियों के प्रयोग का भी आरोप है।
पत्रकारों ने इस संवेदनशील मामले की शिकायत मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तथा खेमेश्वर पुरी गोस्वामी ने केंद्र सरकार के लोक शिकायत निवारण पोर्टल (PM-PG Portal) पर भी विधिवत दर्ज कराई थी और प्रशासन से विहित अवधि में प्राथमिक संज्ञान व यथोचित कार्रवाई का आग्रह किया था।
अनशनकारी खेमेश्वर पुरी गोस्वामी की मुख्य मांगों में पूरे प्रकरण की निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु नियमानुसार उच्चस्तरीय या स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराना, पत्रकारों पर की गई कथित अशोभनीय टिप्पणियों के विरुद्ध वैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई करना और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों का अधिकृत विधि विज्ञान प्रयोगशाला से तकनीकी परीक्षण कराना शामिल है।
प्रशासनिक एवं विधिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी लोक सेवक पर शासकीय आचरण संहिता के उल्लंघन या वित्तीय विसंगति के गंभीर आरोप लगते हैं, तो प्राथमिक जांच स्थापित कर स्थिति स्पष्ट करना प्रशासनिक शुचिता का अनिवार्य अंग होता है। निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी कोई स्पष्ट प्रशासनिक कदम सामने न आने के कारण ही "न्याय में विलंब, वास्तव में न्याय से वंचित करना है" के विधिक सिद्धांत के तहत यह सत्याग्रह शुरू हुआ है।
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि शासन-प्रशासन इस शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक सत्याग्रह पर कब तक संज्ञान लेकर वैधानिक जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है।

