24hnbc
पत्रकारों का धरना प्रदर्शन और उससे ऊपजे प्रश्न...
- By 24hnbc --
- Friday, 19 Jun, 2026
24hnbc.com
बिलासपुर, 20 जून 2026।
19 जून 2026 पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े एक संगठन ने बिलासपुर में पत्रकारों के खिलाफ हो रही एफआईआर के विरोध में, एक प्रदर्शन किया। पत्रकारों का यह प्रदर्शन शहीद आईपीएस विनोद चौबे की प्रतिमा के सामने किया गया। यह प्रतिमा थाना सिविल लाइन के सामने लगी हुई है। आमतौर पर पत्रकारों के खिलाफ पुलिस की एफआईआर का संबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत लिखे गए समाचारों, लेख, खोजी रपट आदि से होता है। ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार का सम्मान हो रहा है। न्यूज क्लिक, द वायर, बीबीसी सहित अलग-अलग भाजपा शासित राज्यों में ऐसे दर्जनों मामले हैं जब पत्रकारों की लेखनी पर अंकुश लगाने के लिए सरकारों ने सट्टा का दुरुपयोग किया है पर किसी भी मामले में धरना प्रदर्शन का औचित्य परखने के पूर्व यह देखा जाना चाहिए की , की किसी भी पत्रकार के खिलाफ यदि एफआईआर दर्ज हुई है तो उसका संबंध लेखनी की स्वतंत्रता से किस तरह जुड़ता है। या एफआईआर जिन कारणों से हुई है वे पत्रकारिता के दायरे में आते हैं या किसी गैर कानूनी गतिविधि के। जिस तरह समझ में नैतिक आदर्श, नैतिक मूल्य का पराभाव हुआ है पत्रकारिता के आदर्श भी अब वैसे नहीं है। नए संदर्भों में पत्रकारिता में वह सब दुर्गुण आया है जो समाज की किसी भी अन्य विद्या में आया है।
पत्रकारिता में पत्रकारों के ऊपर लगने वाला आम आरोप भयादोहन है। यदि जीवन यापन के लिए पत्रकार किसी अन्य व्यवसाय को भी करता है तो वह व्यवसाय नियमों के अंतर्गत ही होना चाहिए। यदि उसे व्यवसाय में जीएसटी चोरी हो रही है, कोयला चोरी की जा रही है, कबाड़ का काम करने के लिए गैर कानूनी तरीकों का सहारा लिया जा रहा है, तो कानूनी प्रावधानों के तहत कार्यवाही होंगी और उनसे बचने के संवैधानिक उपचार प्राप्त हैं उनका उपयोग किया जा सकता है। एक बार पत्रकार हमेशा के लिए पत्रकार का फार्मूला नहीं चलाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ राज्य में बिलासपुर जिला में पत्रकार संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा वैसे ही है जैसी अन्य जिलों में है। इतिहास बताता है पहले एक प्रेस क्लब और एक श्रम कानून के तहत पंजीबद्ध पत्रकार संगठन हुआ करता था। पद पाने की महत्वाकांक्षा ने दर्जनों संगठन खड़े कर दिए। जैसे श्रमिक संगठन के पदाधिकारी अधिकतर वे हुए होते हैं जिन्होंने कभी अपनी पीठ पर बोर नहीं लादा, खदान में काम नहीं किया, गैति फावड़ा नहीं पड़ा वही हाल कुछ पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी का है। यथा राजा तथा प्रजा तो संगठन के पदाधिकारी और सदस्य इस मुहावरे से कैसे बच सकते हैं। सबसे पूछने का हक जिस व्यवस्था ने पत्रकारों को दिया है तो वही व्यवस्था पत्रकारिता में भी लागू है। पत्रकार केवल पूछने वाला नहीं हो सकता कई बार ऐसी परिस्थिति आएगी जब आपको जवाब भी देने होंगे और जो जिम्मेदार इससे बचने की कोशिश करेगा वह दो नुकसान कराएगा। एक अपने संगठन का और दूसरा पत्रकारिता का। संगठन का नुकसान उतना बड़ा नहीं है इसकी क्षतिपूर्ति हो जाएगी। पर पत्रकारिता का जो नुकसान होगा इसकी क्षतिपूर्ति नहीं होगी।


