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संकट (अडानी) चौखट पर नहीं घर के अंदर आ चुका है

रवि नायर के मामले से सीख लेना चाहिए हमें

24hnbc.com
बिलासपुर, 15 फरवरी 2026। 
जंगलबेड़ा सोलर प्लांट और रायगढ़ जिले की एक कोयला खदान दोनों जगह पर आम जनता इन उद्योगों के खिलाफ धरने पर बैठी है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि उद्योगों को गलत तरीके से अनुमति प्रदान की गई है और ग्राम सभा की अनुमति दोषपूर्ण तरीके से प्राप्त की गई है। जंगलबेड़ा में तो स्थानीय विधायक भी आम लोगों के साथ धरने पर बैठा है। इतना ही नहीं कुछ दिन पूर्व जिंदल की एक खदान के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ था। आंदोलन को कुचलना के लिए पुलिस कुछ करती, करते दिखाई दे रही थी तो पूर्वाभास ग्रामीणों ने पुलिस पर ही हमला कर दिया। जो कि किसी भी दृष्टि से सही नहीं कहा जा सकता पर इस सब का परिणाम यह हुआ कि जनसुनवाई की अनुमति वापसी के लिए एक तरफ कलेक्टर महोदय ने पत्राचार किया तो दूसरी तरफ उद्योगपति भी पीछे हट गए। पर अभी तक छत्तीसगढ़ में बड़े अखबार या पत्रकारिता का बड़ा नाम किसी बड़े उद्योगपति के खिलाफ सीधी खोजी खबरें नहीं लगाते जैसे जिंदल, अडानी असल में छत्तीसगढ़ में कोई रवि नायर नहीं बनना चाहता हम रवि नायक का नाम इसलिए ले रहे हैं कि उनके खिलाफ हाल ही में गुजरात की एक कोर्ट ने मानहानि के केस में फैसला सुनाया और रवि नायर को दोषी ठहराया। नायर ने केवल अडानी को नहीं छेड़ा था उनकी एक किताब राफेल सौदा सफेद झूठ में परीधान मंत्री के खिलाफ पर्याप्त लिखा गया है।
छत्तीसगढ़ में आम नागरिकों का जल, जंगल, जमीन का, प्राकृतिक खनिजों का दोहन तो खूब किया जा रहा है पर दोहन की खबरें उतनी मात्रा में नहीं छपती जिस तरीके की लूट चल रही है। केंद्रीय गृह मंत्री और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार नक्सली समस्या को समाप्त जैसा बता रही है पर एक ऐसी खबर भी है जो बताती है कि बस्तर के अंदर नक्सली नेता हिडिंबा के पक्ष में लहर है और उससे सहानुभूति भी स्थानीय लोगों को है होना भी चाहिए यह खबर छिपा ली गई एक पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने स्थानीय लोगों की हिडिंबा के प्रति सहानुभूति को उचित भी ठहराया और बयान भी दिया पर जो स्पष्ट दिख रहा है। कांग्रेस की भूपेश बघेल वाली सरकार के खिलाफ जितनी बेवाकी से समाचार लिखे जाते थे वैसे समाचार और समाचारों की तिक्षणता अब नहीं है। करण वाही गोदी मीडिया अन्यथा रवि नहर मामले में पत्रकार अडानी के खिलाफ एक जूट तो हो जाते क्योंकि अडानी से यदि हसदेव के सामान्य नागरिक कमर कसकर निपटा रहे हैं तो पत्रकार क्यों डरे पर यहां तो पत्रकार और पत्रकारों के संगठन नेताओं को प्रभावशाली अधिकारियों को यदि ज्ञापन देने भी जाते हैं तो ज्ञापन की जगह गुलदस्ता प्राथमिकता से देते हैं और ज्ञापन के स्थान पर गुलदस्ते के फोटो को ही वायरल करते हैं।