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छत्तीसगढ़ को जरूरत है शंकर गुहा नियोगी कि

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बिलासपुर, 27 जनवरी 2026। 
छत्तीसगढ़ की जनता को अपना पूज्य और रोल मॉडल चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए पर उसे सही जानकारी भी तो मिलनी चाहिए। और यह सही जानकारी देने का काम किसका है। 14 फरवरी हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है इसी दिन 1943 को जलपाईगुड़ी में एक साधारण परिवार के भीतर धीरेश गुहा नियोगी जिन्हें हम शंकर गुहा नियोगी के रूप में जानते हैं का जन्म हुआ। यह नाम मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ ही नहीं हर वह श्रमिक जानता है जो पूंजी पतियों के जुल्म का शिकार है। पर हम ऐसे हीरो को जानबूझकर पीछे कर देते हैं क्योंकि हमारी रीड की हड्डी बाजार वाद का गुलाम हो गई है। 
शहर में एक फेरोल पर छूटे सजायाफ्ता के बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं पर छत्तीसगढ़ बनने के बाद कितनी बार ऐसा मौका आया जब संगठित हो या असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और उनके नेताओं ने नियोगी का नाम लिया। आज जब क्रॉनिक पूंजीवाद छत्तीसगढ़ के जल, जंगल, जमीनों को खा रहा है और सरकार उनकी मदद कर रही है तो हमें आसाराम, को याद करना चाहिए या हमारे मन में शंकर गुहा नियोगी बनने की समझ आनी चाहिए। 
कुछ ही दिन पूर्व होम डिलीवरी करने वाले श्रमिकों का हड़ताल हुआ। किस मीडिया ने उस हड़ताल को अपनी हेडलाइन बनाए। छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य से लेकर भिलाई, बलौदाबाजार, मुंगेली, जांजगीर और अन्य स्थानों पर रोज औद्योगिक दुर्घटना के समाचार आते हैं और दूसरे दिन गायब हो जाते हैं। जिन श्रमिकों का खून और देह जलाकर पूंजीपति अपना घर भर रहे हैं उनसे संघर्ष करने के लिए कोई रास्ता तय क्यों नहीं हो रहा कारण श्रम सुधारो के नाम पर सरकार ने मजदूरों के पूरे अधिकार समाप्त कर दिए हैं। आज देश की सबसे बड़ी पॉलीटिकल पार्टी के नेता अपने भाषणों में जॉर्ज फर्नांडिस को याद क्यों नहीं करती वे मंत्री के पहले श्रमिक नेता ही थे। और याद करें वह समय जब उनकी एक आवाज पर मुंबई ठहर गया। भारतीय रेल व्यवस्था पटरी से उतर गई। आज तो सरकार को आईना दिखाने वालों की जगह जेल है। जब कभी पूंजीपति किसी नियोगी से नहीं निपट पाते तो उसका खत्मा गोली मारकर कर दिया जाता है सो 28 सितंबर 1991 के दिन अपने साधारण घर पर सो रहे शंकर गुहा नियोगी के साथ भी यही हुआ। पांच पैर वाला हाथी उन्होंने लिखी है असंगठित ठेका मजदूर को समझने के लिए उनके लिखे को पढ़ना चाहिए। डॉक्टर विनायक सेन दास नियोगी के साथी रहे छत्तीसगढ़ का नक्शा नियोगी ने 1975 में ही बना दिया था पर इसे आज कोई याद क्यों नहीं करता इतिहास को हम कोयला, लोह अयस्क की खदान में दवा क्यों रहे हैं वे कहते थे बुद्धिजीवियों, श्रमको, और किसानों की एक जुटता से ही सच्चा सामाजिक परिवर्तन होगा। छत्तीसगढ़ में श्रमिकों का शराब विरोधी आंदोलन उन्होंने ही रचा सो वे ऐसी किसी व्यवस्था को पसंद नहीं आए जो समाज को सडा रही है। और वर्तमान शासन इसी काम में लगा इसलिए शंकर गुहा नियोगी की जगह किसी को भी होर्डिंग में स्थान मिल सकता है पर यह हम जैसे ईमानदार लिखने वालों को याद रखना चाहिए कि होर्डिंग में आप किसी को ग्लैमर के रूप में दिखा दो पर श्रमिकों के खून में तो नियोगी ही बहेगा।