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30 जनवरी केवल 2 मिनट के मौन से काम नहीं चलेगा

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बिलासपुर, 30 जनवरी 2024।
30 जनवरी 1948 शाम 5:17:30 पर बिरला हाउस दिल्ली में हुई मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या को समझने के लिए केवल 2 मिनट का मौन बहुत ही छोटा है। इस 2 मिनट के मौन को रखने के पहले, और मौन से हटाने के बाद। जितना ज्यादा पढ़ा जाए काम है, बहुत से ऐसे आयाम है जिन पर बात होनी चाहिए क्योंकि 1948 के पहले से ही एक वर्ग ऐसा तैयार हो गया था जो अपनी राजनीति अपनी पहचान गांधी जी की आलोचना करके नहीं गालियां देकर उन्हें कोश कर उनके सिद्धांतों के कारण हिंदू मुसलमानों के बीच विभेद, कटुता बढ़कर अपनी राजनीति कर रहा था। 48 से आज तक ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ती गई। 2014 के बाद पूरे भारत में इस समय एक राहुल गांधी ही ऐसे दिखाई पड़ते हैं जो विचारधारा के स्तर पर भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस, हिंदू महासभा के काम करने के तौर तरीकों को देश हित में नहीं पाते। और उन पर बेबाकी से बात रखते हैं। गांधी जी की हत्या की बात को और आरएसएस, हिंदू महासभा की चर्चा न किया जाए ऐसा नहीं हो सकता। यह घृणित कृत आरएसएस के दामन पर ऐसा दाग है जिस पर बोलने से राहुल गांधी के खिलाफ आरएसएस ने मानहानि का दवा तक कर रखा है। और राहुल गांधी है कि पीछे नहीं हटते, हत्या का दिन 30 जनवरी 1948 और इस मुकदमे के फैसले का दिन 10 फरवरी 1949, जज का नाम आत्मा चरण उन्होंने कोर्ट रूम में 11:30 बजे अपना फैसला दिया कहा गांधी की हत्या में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सजा विष्णु करकरे, मदन लाल पाहवा, शंकर किस्टेया , गोपाल गोडसे, दत्तात्रेय परचुरे को आजीवन कैद। जज ने दामोदरदास सावरकर को बेगुनाह करार दिया। हमारी न्याय प्रणाली पारदर्शिता से भरपूर है तभी तो गोडसे को उसका पूरा बयान पढ़ते दिया गया। बयान एक दो पन्ने में नहीं 93 पन्नों में था, 45 मिनट में पड़ा पूरे बयान में उसने भरपूर कोशिश की कि समाज को बांटा जाए। गोडसे के बयान के बाद सरकारी वकील ने कोर्ट के रिकॉर्ड से इसे हटाने का आग्रह किया पर जज ने गोडसे के बयान को रिकॉर्ड से हटने से इनकार किया और कहा कि अदालत में लिखित बयान स्वीकार किए जाते हैं। कल्पना करें वर्तमान सांसद की जो आलोचना सरकार की अध्यक्ष को पसंद नहीं आते, सभापति को पसंद नहीं आती उसे संसद के रिकॉर्ड से हटा दिया जाता है। आज गोदी मीडिया गोडसे के 93 पेज वाले बयान की खूब चर्चा करती है यह इसलिए संभव है कि वह कोर्ट के रिकॉर्ड पर है। समझे उसे समय की व्यवस्था संविधान के चेक एंड बैलेंस काम कर रहे थे तभी गोडसे का बयान आज मौजूद है। गांधी जी की हत्या के 17 साल बाद एक जांच आयोग का गठन किया गया। कोर्ट के फैसले में भी लिखा था गांधी की हत्या कोई अचानक नहीं हुई। आजाद भारत में पुलिस की लापरवाही की कहानी है ये 17 साल बाद 22 मार्च 1965 को इसकी जांच के लिए एक आयोग का गठन हुआ कमान सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जस्टिस जीवनलाल कपूर को मिली इसलिए इसे कपूर कमीशन के नाम से जाना जाता है। 12 अक्टूबर 1964 को नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे, विष्णु करकरे, मदन लाल पाहवा आजीवन उम्र कैद की सजा काटकर रिहा हो गए। वे दोनों जब पुणे पहुंचे 12 नवंबर 1964 को सत्य विनायक पुजा आयोजित की गई। खुशी में पूजा का आयोजन किया गया इस आयोजन में 200 लोग सरिख हुए थे और नाथूराम गोडसे को देश भक्त कहा गया था। अभी हाल ही में बलात्कार के जुर्म में माफी पाये का भी ऐसे ही सम्मान हुआ कहने का अर्थ है ऐसी ताकत है 48 में भी 64 में भी और अभी 2023 में भी सक्रिय हैं। हमारे देश में प्रधानमंत्री के कातिलों का भी सम्मान हो जाता है। एक उदाहरण इंदिरा गांधी के कातिलों का है जिसमें बेयंत परिवार से हत्यारे की पत्नी संसद तक बन गई। 12 नवंबर 1964 के दिन सबसे हैरान कर देने वाला बयान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के नाती जीवी केतकर का है वे दो पत्रिकाओं केसरी और तरुण भारत के संपादक रहे। उन्होंने कहा "कुछ हफ्ते पहले ही गोडसे ने अपना इरादा शिवाजी मंदिर में आयोजित एक सभा में व्यक्त किया था गोडसे ने कहा था कि गांधी कहते हैं कि वह 125 तक जिंदा रहेंगे लेकिन उन्हें 125 साल तक जीने कौन देगा" इंडियन एक्सप्रेस में यह पूरी रिपोर्ट छपी है। रिपोर्ट में वह तस्वीर भी छपी है जिसमें नाथूराम गोडसे को माला पहनकर श्रद्धांजलि दी गई। इसी बयान के बाद केतकर की गिरफ्तारी हुई गोपाल गोडसे को गिरफ्तार कर फिर से जेल भेजा गया और कपूर कमीशन गठित हुआ। इस कमीशन में मनी बेन, सरदार पटेल की बेटी की गवाही भी हुई ऐसे बहुत से मामले हैं जहां पर स्पष्ट होता है कि 30 जनवरी के पहले 20 जनवरी को गोडसे गुट ने प्रार्थना सभा में जो बम फेंका था हत्या उसी दिन होनी थी पर मौका नहीं मिला और यही से वह खुलासा होता है जिससे पता चलता है कि पुलिस ने पूरे मामले को कितनी लापरवाही के साथ जांचा। हत्याकांड में शामिल एक-एक आदमी हिंदू महासभा, और आरएसएस से संबंध था उन्होंने कभी भी स्वयं को संगठन से अलग नहीं किया। उनके बयानों में यहां तक आता है कि संगठन उनके घर थे। ऐसे में इन संगठनों की भूमिका आज भी विचार के दायरे में है। राहुल गांधी इसी लड़ाई को लड़ रहे हैं और इसलिए आज हम ने इस पूरे घटनाक्रम पर दोबारा लिखा है।