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ईडब्ल्यूएस कोटा आर्थिक नहीं जाति पर आधारित है
- By 24hnbc --
- Tuesday, 06 Dec, 2022
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समाचार -
बिलासपुर, 7 दिसंबर 2022। ईडब्ल्यूएस कोटा छत्तीसगढ़ में एक बार फिर से चर्चा का विषय है सरकारी नौकरी और डिग्री देने वाली सरकारी संस्थाओं में भारतीय समाज के उन जातियों को 10% का आरक्षण केंद्र सरकार ने दिया सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की संविधान पीठ ने 3 जज के बहुमत के आधार पर इस पर मुहर लगा दी अब छत्तीसगढ़ में इसमें कटौती हुई और यह 10 से घटकर 4% पर आ गई पर हमारी चर्चा इसके जातिगत आधार को लेकर हैं। हमारे अनुसार ईडब्ल्यूएस आरक्षण विशुद्ध जाति पर आधारित है जाति के आधार पर आरक्षण और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर प्रतिनिधित्व के अंतर को समझा जाना चाहिए। सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर प्रतिनिधित्व का मतलब यह है कि भारतीय समाज में जिन लोगों को पढ़ने लिखने से वंचित रखा गया है जिन्हें समाज को संचालित करने वाले कामों में भाग लेने से वर्जित रखा गया है उन्हें संविधान वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था में मौका दिया जाना चाहिए ये प्रतिनिधित्व के आधार पर हो, ताकि प्रतिनिधित्व से वैसे तमाम लोगों में अपनी काबिलियत को लेकर एक भरोसा हो। सामाजिक पिछड़ेपन की पहचान के लिए मापदंड किए गए इसमें आर्थिक पिछड़ेपन की कोई बात शामिल नहीं की गई इसलिए इसे जाति आरक्षण नहीं कहा जाता इसे सामाजिक न्याय के दूर ग्रामीण लक्ष्य में शामिल माना जाता है। स्पष्ट है कि आर्थिक न्याय के कार्यक्रम नहीं है। संविधान में सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर अवसर देने की व्यवस्था की गई है। यदि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात है तो फिर देश की अधिकांश आबादी के लिए आरक्षण करना पड़ेगा केवल 80 करोड़ तो सस्ते और मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। 10% का आरक्षण आर्थिक आधार पर भले कहा जा रहा हो लेकिन यह वास्तव में जातियों के आरक्षण का फैसला है क्योंकि यह केवल भारतीय समाज के इतिहास के उन लोगों के लिए है जो जाति के आधार पर शासक बने रहे हैं और समाज के लिए जरूरी किसी भी तरह के उत्पादन के काम से अपने को दूर रखना अपना धर्म मानते हैं यानी सामाजिक वर्चस्व की स्थिति को बनाए रखने के लिए पहली बार आरक्षण की व्यवस्था की गई है स्पष्ट है कि सामाजिक वर्चस्व और सांप्रदायिकता की राजनीति का सीधा रिश्ता है। 1991 में पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में अवसर सुनिश्चित करने का फैसला विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने किया था। भारत सरकार ने उस नई आर्थिक व्यवस्था में शामिल होने का फैसला कर लिया था जो दुनिया के सबसे ज्यादा अमीरों के नेतृत्व में बनाने का फैसला किया गया था गरीबों पर शासन ने जारी रखने वाले अमीरों के नेतृत्व में नई आर्थिक व्यवस्था बनाने का यह फैसला था। बीपी सिंह की सरकार ने सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए अवसर देने के सैकड़ों वर्ष पुराने आंदोलन की बात सुनी और इसी बीच आर्थिक व्यवस्था के वक्त सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर अवसर देने का फैसला अपने सामाजिक न्याय के लिए दो आपस में कभी ना मिल पाने वाले दो छोरो पर खड़े होने के सामान लगता है।


