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जल, जंगल, जमीन, लोहा, कोयला उनका , लूट हमारी आदिवासी दिवस पर विशेष

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। आज विश्व आदिवासी दिवस है और अभी तो पूरे राष्ट्र को इस बात पर गर्व है कि देश की राष्ट्रपति महामहिम आदिवासी वर्ग से ही आते हैं। अब सवाल है कि कोन्टा से कोटा, कोंडागांव से मयूरभंज या पूर्वोत्तर के सेवन सिस्टर प्रदेश में बसा हुआ वनवासी, मूलनिवासी, धरतीपुत्र आदिवासी कैसे हो गए। 1947 जब भारत स्वतंत्र हुआ से लेकर आज जब वनवासी, मूलनिवासी वर्ग से देश का प्रथम नागरिक चुना गया है तब हमें सुकमा से दिल्ली पहुंची सोनी सोरी की याद आती है वे पिछले 2 दिनों से दिल्ली में सुकमा के वनवासियों के साथ विश्वविद्यालय गेट पर बैठी हैं। वे चाहते हैं कि देश की राष्ट्रपति उन्हें मिलने का समय दें और जाने की नारायणपुर, सुकमा, कोंडागांव, गूगंरक्का में क्या चल रहा है कैसे पुलिस फायरिंग में सिलगेर में तीन वनवासी मार दिए गए। 1 साल से अधिक समय हो गया इस क्षेत्र के मूलनिवासी प्रशासन, पुलिस, सुरक्षा बल के अत्याचार के खिलाफ धरना प्रदर्शन पर है। हमारे आपके लिए जो खनिज धन संपत्ति है वही खनिज लोहा इनके लिए इनकी जान का दुश्मन बन गया है। पहाड़ी नंबर 12 के पीछे रोड बन रही है वनवासी आरोप लगाते हैं कि रोड बनने के बाद वन क्षेत्र काटा जाएगा सुरक्षा बल का कैंप लग जाएगा और लौह अयस्क खुद आ जाएगा सरकार विकास के लिए रोड निर्माण जरूरी कहती है वनवासी कहता है रोड किन के लिए है हम निकलते हैं तो सुरक्षा बल के जवान हमको तलाशी के नाम पर घंटों बिठालते हैं । क्षेत्र में लोहा खनन के लिए कम से कम 4920 हेक्टेयर वन भूमि को बदल दिया गया है सीधी सी बात है छत्तीसगढ़ का लोहा और कोयला यहां के मूल निवासियों के लिए सबसे बड़ी आफत बन गया है। सोनी सोरी सरकारी स्कूल में शिक्षक थी स्कूल में सुरक्षा बल का कैंप लग गया शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त हुई सोनी सोरी इस मुद्दे को लेकर दिल्ली तक गई 1 दिन पुलिस ने दिल्ली में उन्हें पकड़ा और छत्तीसगढ़ पुलिस के हवाले कर दिया। एक-दो दिन नहीं उन्हें लंबे समय जेल में रहना पड़ा। 2014 में उनकी रिहाई हुई 8 मामलों में से 6 मामलों में निर्दोष करार दी गई एक मामला अभी चल रहा है। सोनी सोरी ने उस वक्त के इंटरव्यू में स्पष्ट कहा उन्हें जेल में नंगा करके तत्कालीन एसपी अंकित गर्ग के कहने पर बिजली के झटके दिए गए उन्हें अक्सर ही नंगा बैठाया जाता था जब कभी भी पेशी होती थी उसके पहले की रात बेहद कठिन हो जाती थी, कोर्ट के आदेश पर रायपुर मेडिकल के लिए रेफर किया गया हालत बेहद गंभीर थी मेडिकल कॉलेज कोलकाता इलाज के लिए भेजा गया डॉक्टरों ने उनकी योनि से पत्थर के टुकड़े निकाले और यौन प्रताड़ना की पुष्टि भी कर दी जेल से बाहर आने के बाद उनकी हिम्मत दोगुनी हो गई और वे एक गांव से दूसरे गांव घूम घूम कर मूलनिवासी जागरण के काम पर लग गई। इसी बीच 11 फरवरी 2016 को उन पर केमिकल अटैक भी हुआ इस बीच में उन्हें संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान से नवाजा भी गया है सवाल यह उठता है कि 1947 में स्वतंत्रता के बाद हमारा ही शासन हमारे ही जनप्रतिनिधि हमारे ही समाज के अधिकारी और शासन व्यवस्था वनवासियों के साथ क्या व्यवहार कर रहे हैं। देश के कई शहरों में विश्व आदिवासी दिवस पर कार्यक्रम हो रहे हैं महंगी दर पर लाखों रुपए खर्च करके विज्ञापन छापे जा रहे हैं इस संदर्भ में बिलासपुर के वरिष्ठ मूलनिवासी नेता संत कुमार नेताम ने अपना अभी मत रखा कहा कि किसी भी स्तर पर मूलनिवासी की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। शहर में लगे हुए पोस्टर में केवल एक ही जाति विशेष के विज्ञापन अनुचित हैं इसे आदिवासी समाज का पोस्टर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार केवल आदिवासियों को गुमराह कर रही है पांचवी अनुसूचित क्षेत्र के जल, जंगल, जमीन को बेच दिया गया है और बुढ़ा देव की संस्कृति खत्म करने की साजिश रची जा रही है। छत्तीसगढ़ का बड़ा क्षेत्र पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है जिसके अनुसार संविधान का अनुच्छेद 244 ए लागू होता है जिसके मुताबिक इन इलाकों में विधानसभा या राज्य सभा द्वारा बनाया गया कोई भी कानून लागू नहीं होता आदिवासियों को पूर्ण स्वशासन और नियंत्रण की शक्ति विधि द्वारा प्राप्त है आदिवासी बहुल्य क्षेत्र होने के कारण यहां किसी भी तरह के बाहरी शासन और प्रशासन को पेशा कानून के तहत ग्राम सभा से प्रस्ताव पारित कराना अनिवार्य है। अर्थात सुरक्षाबलो का कैंप लगाने के पूर्व भी ग्राम सभा से प्रस्ताव पास कराया जाना चाहिए। सिलेगर में जो कुछ हो रहा है उसमें नया कुछ नहीं है नया यह है कि अब महामहिम उसी वर्ग से आती है जिस पर शासन प्रशासन सर्वाधिक अन्याय करता है ऐसे में दिखावटी नारे आदिवासी सम्मान महिला सम्मान केवल नेशनल हाईवे की ऐसी दफ्तरों की विषय वस्तु बन जाता है वास्तविकता तो वही रहती है और जुल्मीहाथं उन्हीं के हैं और अत्याचार उसे ही सहना है जो आजादी के 75 साल बाद भी अपना जल जंगल, जमीन, बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।