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सावन के माह में महादेव की इस किताब में मचा दी खलबली

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। दक्षिण भारत में इन दिनों कन्नड़ के साहित्यकार देवानुर महादेव द्वारा आर एस एस पर लिखी गई 64 पेज की किताब आर एस एस की गहराई और चौड़ाई वायरल हो रही है। बीजेपी ने इसे कचरा कहा इस किताब की प्रिंट कॉपी की मांग इतनी ज्यादा है कि पूर्ति नहीं हो पा रही है साइबर जगत में अनाधिकृत पीडीएफ शेयर किए जा रहे हैं हिंदी, तमिल, तेलुगू, अंग्रेजी अनुवाद भी हो रहा है। 64 पेज की इस किताब को कर्नाटक में महिला समूह द्वारा भी प्रकाशित किया जा रहा है। महादेव देश के चर्चित साहित्यकार हैं और जातिवाद को सामाजिक संदर्भों में बारीकी से देखते हैं उनका यह वक्तव्य पढ़ें भगवत गीता को पढ़ाने पर जोर देना देश में जाति व्यवस्था को बढ़ावा देना है जैसा कि मनु स्मृति में बताया गया है वे कहते हैं यह संविधान को कॉपी पेस्ट बताकर बदनाम करने के प्रयास जैसा है। वे कहते हैं बीजेपी एक गैर संवैधानिक राजनैतिक दल है जिसका नियंत्रण आर एस एस के हाथ में है इसके देवता गर्भ ग्रह में विराजमान हैं जो नागपुर में हैं बीजेपी का नेतृत्व नागपुर में देवता से मिले निर्देश अनुसार ही चलता है यहां दाएं या बाएं तरफ फूल गिरने को भगवान के संदेश के तौर पर लिया जाता है आगे कहते हैं यही वजह है कि बीजेपी के नेता आर एस एस को खुश करने की होड़ में लगे रहते हैं वे इसके लिए एक दूसरे से प्रतिद्वंदिता भी करते हैं इसलिए ही बीजेपी जैसी पार्टी में अपना कोई संविधान नहीं है वो ऐसे ही किसी नेता को अपने दम पर मजबूत नहीं होने देते लेखक के कहते हैं कि प्रधानमंत्री स्वयं को ओबीसी बताते हैं तो आज तक ओबीसी वर्ग के लोग को कितना रोजगार मिला है हां उन्होंने करोड़पति ओके तक जरूर कम किए हैं उनके कर्ज माफ किए जा रहे हैं सार्वजनिक संपत्तियों उन्हें कम दामों पर बेची जा रही है अमीर लोगों की दौलत में करोड़ों का इजाफा हो रहा है सरकार कारपोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचा रही है। देश में आदिवासी ही मूल निवासी है लेकिन इन लोगों के मूल निवासियों का नाम ही हटा दिया है और उन्हें वनवासी बना दिया है। वनवासी कल्याण आश्रम के संदर्भ में यह कहा गया आज आदिवासी इन कट्टरवादी ताकतों के हाथों में दूसरे धर्मों से लड़ने का हथियार बन गया है क्या इससे कोई बदलाव आएगा क्या यह सही विकास है पुस्तक में आर एस एस को मानने वालों की तीखी आलोचना हुई है। महादेव विद्रोही साहित्य आंदोलन के अगुआ लेखक हैं वे सामाजिक और आर्थिक न्याय पर लिखते रहे हैं 2015 में उन्होंने पद्मश्री और साहित्य अकैडमी अवॉर्ड लौटा दिया । 1990 में उन्हें राज्यसभा जाने का प्रस्ताव मिला उन्होंने उसे भी अस्वीकार कर दिया। गीता की शिक्षा और संविधान पर वे बेबाकी से राय रखते हैं। कहते हैं ये विश्वास करना सर्वनाश शक है कि भगवान ने ही चतुर्वर्ण सामाजिक व्यवस्था कि वर्ण व्यवस्था को बनाया आज के दौर में ये सवाल उठता है कि क्या भगवत गीता को बढ़ावा देना संविधान पर चोट नहीं है क्योंकि यह हिंदू धर्म पर आधारित चतुर वर्ण व्यवस्था को बढ़ावा देती है। आगे जाकर वे कहते हैं ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के लोग कुछ हद तक बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि इसमें से अधिकतर मीडिया प्रबंधन, इन समुदायों में निवेश और मंच से प्रबंधित हैं ऐसे में उन्होंने यह भ्रम बना दिया है कि वो इन समुदायों के लिए बहुत कुछ कर रहा है मुझे तो सिर्फ बेरोजगारी का विकास नहीं दिखाई देता है ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों के युवा बेचैन है और बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। यह किताब ऐसे समय पर आई है जब कर्नाटक में चुनाव होने वाले हैं। किताब धड़ल्ले से बाटी जा रही है वायरल हो रही है अनुवाद हो रहा है और कहां जा रहा है कि आज देश को बचाने के लिए सामाजिक सहीसुडता बनाने के लिए संविधान के रास्ते पर चलना जरूरी है। हमें विचारों की सही सहनशीलता की धारा को बनाए रखना है। भारत के भविष्य को शानदार मानवीय मूल्यों और रिश्तो के लिए बना कर रखना है इसलिए देश में किसी को भी नजरअंदाज नहीं करना है कुल मिलाकर हिंदी पट्टी में भले ही इस किताब की चर्चा ना हो रही हो पर दक्षिण भारत में विशेषकर युवाओं के बीच या किताब इन दिनों बेहद चर्चित है।