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खस्ताहाल अर्थव्यवस्था ठेके पर सरकार

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। सरकार पर कर्ज बढ़ रहा है पूर्व के मुकाबले यह 49% बढ़ा है कहने में कोई हर्ज नहीं कि नागरिक इस कर्ज को चुकाने में असहयोग कर सकते हैं क्योंकि सत्तारूढ़ राजनीतिक दल ने कभी भी अपने घोषणा पत्र में यह नहीं कहा था कि वह देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन का बनाने के लिए इतना कर्ज लेगी। 2014 में 54 लाख 90 हजार 763 करोड़ का कर्ज था सितंबर 2018 में यह बढ़कर 82 लाख 253 हजार करोड़ के ऊपर चला गया और अभी 155 लाख करोड़ को टच कर रहा है। 2014 में भारत सरकार पर कोई गोल्ड लोन नहीं था अब गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम के तहत केंद्र सरकार पर 9098 करोड़ का कर्ज है। सरकारें आंकड़ों में खूब खेल करती हैं जीडीपी 8% है। प्रति व्यक्ति आय लाख रुपए के ऊपर चल रही है ऐसे में भारत के अंदर कुपोषित लोगों की संख्या 76 से 77 करोड़ कैसे हो गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने पौष्टिक खाना मिलने के लिए ₹235 की जरूरत होती है और ऐसा खाना देश की 71% जनता को उपलब्ध नहीं है संयुक्त राष्ट्र संघ की मांग ने तो यह आंकड़ा 85% है अर्थात देश के 85% लोगों को पोषण युक्त आहार नहीं मिलता। बैंक ब्याज दरों के आधार पर भी कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल है। पोस्ट ऑफिस में पहले 7.6% ब्याज था अब घटकर 6.7 है, आरडी थी पर 7.1% ब्याज था अब 5.8% है साफ नजर आता है सरकार में बैठे निर्वाचित जनप्रतिनिधि और ठेके पर काम करने वाले कर्मी के पास कोई विजन नहीं है। पीएसयू में पहले नौकरी मिलती थी अब ठेका कर्मी है। एक झटके में 4.50 लाख नौकरियां खत्म की गई। यूपीएससी के माध्यम से 2014 में 7800 पद भरे गए 2021 में यह घटकर 3986 हो गए ओएनजीसी की बात करें 2014 में ठेके पर कार्यरत श्रमिकों की संख्या जीरो थी अब 17000 श्रमिक के ठेके पर हैं भारत पेट्रोलियम में 28000 श्रमिक के ठेके पर हैं इसी तरह इंडियन ऑयल में 73000 श्रमिक ठेके पर हैं डबल इंजन वाली सरकार हरियाणा में बेरोजगारी दर 34% है तो राजस्थान का हाल भी बुरा है यहां पर बेरोजगारी दर 30% है पिछले 5 साल में शासन पर एकाधिकार का परिणाम यह हुआ कि आर एस एस जैसे बड़े संगठन के 3 विंग भारत मजदूर संघ विश्व हिंदू परिषद स्वदेशी के तमाम तर्कों को खारिज करते हुए सरकार ने अपनी नीति थोप दी। अपना चलाने के कारण दो हजार करोड़ रुपए रोज सरकार रिजर्व फंड से खर्च कर रही है देश के भीतर अब ना चुनाव आयोग की जरूरत है ना निर्वाचन आयोग की बड़े संवैधानिक पदों पर नियुक्ति राय मशवरे से नहीं होती पूरा साल बीत जाता है सीएजी की रिपोर्ट संसद के पटल पर नहीं रखी जाती यहां तक कि संसद में विपक्षी दलों के सांसदों को बोलने का मौका ही नहीं दिया जाता विचार विमर्श की प्रक्रिया पहले शिथिल की गई अब समाप्त कर दी गई। मतदाता का जैसा अनादर इन दिनों हो रहा है ऐसा कभी नहीं किया गया चाहे देश का नेतृत्व किसी के पास रहा हो विधानसभा के किसी भी छोटे बड़े सीट पर मतदान का प्रतिशत 52% के ऊपर है जीता हुआ प्रत्याशी कम से कम उस क्षेत्र का 50000 वोट तो पता ही है जिन 50000 लोगों ने जिस पार्टी को वोट दिया जो व्यक्ति जिसका भले ही उसकी सरकार ना हो जो सत्ता में बैठा है उसे यह हक किसने दे दिया की जीते हुए विरोधी दल के विधायक को अपनी पार्टी में शामिल कर ले यह सीधा-सीधा मतदाताओं का अपमान है दलबदल कानून अब बेईमानी हो गया है नियम तो सीधा होना चाहिए जो व्यक्ति जिस चुनाव चिन्ह पर चुनाव जीतेगा अगले चुनाव के पूर्व उस चिन्ह को नहीं बदल सकता यदि बदलेगा तो उस विधानसभा क्षेत्र में जनमत संग्रह करा लें अन्यथा उस विधानसभा क्षेत्र में दोबारा चुनाव हो, और इस काम के लिए कोई राजनीतिक दल आगे नहीं आए तो नागरिकों को या तो आंदोलन के माध्यम से अन्यथा कानूनी विकल्पों के तहत अपनी बात मनवाने चाहिए।