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1 मई मजदूर दिवस अब शुभकामना, बधाई का दिन नहीं है वर्तमान संदर्भ में
- By 24hnbc --
- Saturday, 30 Apr, 2022
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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। ब्रिटेन हो या अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका हो या भारत किसी भी देश की तरक्की में जितना योगदान बड़े निधि कलकारखानों का है उसके मुकाबले श्रमिकों के योगदान को कम करके नहीं आता जा सकता। चाहे समाजवाद हो मिश्रित अर्थव्यवस्था हो या शुद्ध पूंजीवाद जो इस समय चल रहा है किसी भी स्थिति में श्रमिकों के योगदान को नजरअंदाज करके एक ऐसे समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता जो मल्टी लेवल मार्केटिंग के पिरामिड फार्मूले पर बन रहा हो , जो इन दिनों दिखाई दे रहा है। स्वतंत्र भारत में मजदूरों के हित संरक्षण के लिए कई कानून बने 2014 आते-आते विशेषकर 2014 के बाद श्रमिकों के हित के कानूनों को किस तरह खत्म किया जाए पर माननीयों ने खूब मेहनत की या यूं कहें मेहनत कारपोरेट ने की कैसा कानून चाहिए उन्होंने बताया और माननीयों ने अपने पार्टी प्रमुखों के इशारे पर सबको माना लिया। संसद में नए श्रमिक कानून बनाए जाने और पुराणों को खत्म करने पर चर्चा भी नहीं की, एक-एक करके श्रम हित के कानून समाप्त करना और यह सोचना कि सस्ता श्रम उद्योग हित में होगा यह गणित अब भारी पड़ रहा है रही सही कसर कोविड-19 ने पूरी कर दी, आज 1 मई है एक तरफ तेज गर्मी पारा 45 के ऊपर तो दूसरी और घोड़े के समान तेज दौड़ती महंगाई और तेल 175 के पार वह भी 910 ग्राम बंद मनरेगा जिसे फुल फॉर्म में महात्मा गांधी रोजगार गारंटी कानून कहा जाता है। इस योजना का एक से अधिक बार देश के प्रधानमंत्री ने मखौल उड़ाया है यहां तक कहा कि यह कानून कांग्रेस की ऐसी गलती है जिसे हम केवल इस लिए जिंदा रखेंगे कि समय-समय पर इस योजना से कांग्रेस को नीचा दिखाएंगे और इसी रोजगार गारंटी कानून ने 2019 के बाद कोविड-19 काल में आठवीं फेल और बीई, एमएससी, बीएससी पास लोगों को गांव में काम दिया और परिवार किसी तरह चला सकने का गौरव दिया। कोविड-19 की मार के बाद अब देश की अर्थव्यवस्था इस बुरी तरह बेपटरी हुई है की रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी अपने रिपोर्ट में इस बात को स्वीकार कर लिया है कि देश की अर्थव्यवस्था अब 2035 के पहले सामान्य स्थिति में नहीं आएगी केवल पूंजीपतियों को उनकी इच्छा के अनुकूल नियम बनाकर देने से बाजार में डिमांड पैदा नहीं की जा सकती जब तक देश के श्रमिक वर्ग उपभोक्ता वर्ग के खाते में सीधा कैश नहीं दिया जाएगा तब तक बाजार में उपभोक्ता दुबारा नहीं आएगा। आज भी औद्योगिक क्षेत्रों की चिमनिया खामोश खड़ी हैं और सरकार षड्यंत्र में लगी है कि मजदूरों को और सस्ता कैसे किया जाए सस्ते होकर वे औद्योगिक इकाइयों पर पहुंचे और अपना शोषण कराएं दूसरी ओर श्रमिक अब गांव छोड़कर 2019 की गंदगी में जाना नहीं चाहता ऐसे में देश के एक बहुत बड़े हिस्से में एक ऐसी चिंगारी खामोशी के साथ बैठी है जिसे यदि किसी जेपी का सहयोग मिल गया तो दिल्ली का सिंहासन डोलता नजर आएगा 1 मई श्रम दिवस अब शुभकामना और बधाई का दिन नहीं रह गया है।
शशांक दुबे की कलम से.. . ..


