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मेरा भगवा तुम्हारे भगवे से ज्यादा भगवा, संविधान के अनुसार चलने में दिक्कत है क्या.....?

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर । 26 जनवरी 1950 जब हमने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की और 26 जनवरी को जिस संविधान को अंगीकार किया उसकी प्रस्तावना कहती है कि " संविधान भारत के लोगों से शक्ति अधिगृहित करता है। भारत की प्रकृति यह घोषणा करती है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतांत्रिक, राज व्यवस्था वाला देश है" न्याय स्वतंत्रता समता व बंधुत्व संविधान के उद्देश्य हैं। संविधान की प्रस्तावना को संविधान का परिचय पत्र कहा है कहते हैं। संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मअर्पित करते हैं। 
इस प्रस्तावना को हम आप ने कभी ना कभी कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में पढ़ा होगा कुछ ने तो इसे रटकर परीक्षाओं में जवाब भी लिखे होंगे। प्रश्न यह है कि आज ऐसी कौन सी स्थिति निर्मित हो गई की हम अपने प्यारे भारत देश को हिंदू राष्ट्र बनाने पर आमादा हैं और आरएसएस का हिंदू राष्ट्र या किसी और हिंदू राष्ट्र जो आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के मुकाबले खड़ा किया जा रहा है के बीच कौन सा अंतर है। छत्तीसगढ़ के स्थितियों के अनुसार 2 जिले हिंदुत्व की प्रयोगशाला बन रहे हैं। पहला जिला कवर्धा जहां पर करपात्री महाराज वाला प्रयोग हो रहा है और दूसरा बिलासपुर जहां पर निश्चलानंद वाला प्रयोग हो रहा है, इस बीच में रायपुर की धर्मसभा भी है संसद तो वह कदापि नहीं थी क्योंकि संसद तो देश में एक ही है। अब हम समझे कि वे कौन सी ताकतें हैं जो एक हिंदू राष्ट्र के प्रत्यय को दूसरे हिंदू राष्ट्र के प्रत्यय से रोकना चाहते हैं यह कहां की राजनीति है यदि जनता के बीच बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर नहीं जाना है और देश को अव्यवस्था से बचाने के लिए काम करना है तो राष्ट्रवाद का उचित तरीका तो संवैधानिक राष्ट्रवादी ही है। धर्म की घुट्टी जनता को किसी भी रूप में पिलाई जाए वह व्यक्तित्व निर्माण तो नहीं करेगी। मेरा धर्म अन्य से श्रेष्ठ है, यह भाव तो आएगा ही, और यही भाव नागरिक नागरिक के बीच विभेद करेगा और इस विभेद से बचने का एक ही तरीका है कि हम अपने संविधान का व्यापक प्रचार प्रसार करें जितनी संगोष्ठी हम धार्मिक मसलों पर करते हैं उससे ज्यादा संगोष्ठीयां संविधान पर हो जिस दिन भी कोई भी विवाद चाहे वह किसी भी मसले पर हो वर्तमान व्यवस्था के द्वारा सुना जाएगा उस पर निर्णय लिया जाएगा तो उसका आधार संवैधानिक ही होगा इसके तहत धार्मिक मामले भी आएंगे छत्तीसगढ़ में इन दिनों आरएसएस बहुत तेजी से सोशल मीडिया पर एमएमए नाम से ग्रुप बना रहा था हो सकता है यह पूरे प्रदेश के अंदर बनाया गया हो लेकिन इतना तय है कि इस ग्रुप के तहत हर वार्ड को लिया गया बाद में ग्रुप के नाम में संशोधित हुआ और वर्तमान में यह वंदे मातरम के नाम से संचालित है और यह प्रयोग कवर्धा के कांड के बाद ही हुआ है अब ऐसा लगता है कि उसे हिंदू राष्ट्र को दुरुस्ती करण के साथ एक नए रूप में लाया जा रहा है यह केवल हाड और सॉफ्ट के बीच का अंतर है । इसे कांटे से कांटा निकालना ही कहा जा सकता है समाज में असली शांति भाईचारा समन्वय तरक्की तो तभी होगी जब देश के नागरिक देश को संविधान के अनुसार जैसा वह है स्वीकार करें अन्यथा  मेरा भगवा  ज्यादा भगवा है कि राजनीति समाज को नुकसान ही देगी।