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हाई कोर्ट का परिसर और मनु की मूर्ति

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समाचार - बिलासपुर
बिलासपुर। बीआर अंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 महाराष्ट्र के महाड में पब्लिकली मनुस्मृति को जलाया और कहा कि यह दलित व मानव अधिकारों के विरुद्ध किताब है। उन्होंने मनुस्मृति को जलाए जाने को 1789 की फ्रेंच रिवोल्यूशन के बराबर बताया देश का राजस्थान हाई कोर्ट एकमात्र हाईकोर्ट है जहां पर मनु की मूर्ति लगी हुई है 28 जून 1989 के दिन राजस्थान हाई कोर्ट के नए परिसर में मनु की मूर्ति का इंस्टॉलेशन हुआ तभी से इसे हटाए जाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। 27 जुलाई 1989 हाईकोर्ट की ही एक प्रशासनिक पीठ ने 48 घंटों के भीतर इस मूर्ति को हटाने का आदेश दिया विश्व हिंदू परिषद के आचार्य धर्मेंद्र ने एक रिट पिटिशन जस्टिस महेंद्र भूषण के कोर्ट में प्रस्तुत की और न्यायाधीश ने मूर्ति के हटाए जाने पर स्थगन देते हुए इसे वृहद पीठ को ट्रांसफर कर दिया तब से केवल दो बार इसकी सुनवाई हुई है। संविधान का अनुच्छेद 13 यह कहता है कि 26 जनवरी 1950 के बाद कोई भी पुरानी पुस्तक परंपरा या विधान जो मौलिक अधिकार का हनन करें वह गलत माना जाएगा उसे अनुच्छेद 13 का उल्लंघन माना जाएगा इस लिहाज से मनु की यह मूर्ति न्यायालय परिसर में नहीं होनी चाहिए इसी बात को आधार बना कर 3 जनवरी 2017 को 20 से ज्यादा दलित संगठनों ने एक बार फिर से यह मांग उठाई कि न्यायालय अपने यहां लंबित है अपने यहां लंबित मामलों का निराकरण करें। 2 महिलाओं ने महाराष्ट्र से राजस्थान आकर इस मूर्ति पर 10 अक्टूबर 2018 को काला पोत दिया। 13 अगस्त 2015 को राजस्थान हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुनील अंबवानी की पीठ में इस मूर्ति के संबंध में सुनवाई हुई थी तब याचिकाकर्ता पीएल भीमरोड के अधिवक्ता अजय जैन ने जैसे ही अपने तर्क शुरू किए बड़ी संख्या में अधिवक्ता अंदर घुस गए और शोर मचाने लगे तब से इस प्रकरण को दोबारा लिस्टिंग नहीं किया गया । अब जब देश के अंदर सनातनधर्मीयों ने एक बार फिर से मनु स्मृति की प्रशंसा प्रारंभ में की है दलित संगठनों के बीच यह मांग उठ रही है कि राजस्थान हाई कोर्ट के परिसर से मनु की यह मूर्ति हटाई जाए क्योंकि इस मूर्ति के होने मात्र से संविधान को नीचा दिखाया जाता है कुल मिलाकर देश में कुछ राजनीतिज्ञ धर्म की आड़ में अपने राजनीतिक रोटयों को सेक रहे हैं ऐसे में संवैधानिक राष्ट्रवाद ही एकमात्र विकल्प है।