No icon

24hnbc

बिलासपुर प्रेस क्लब संदर्भ - 2

24hnbc.com

समाचार -
बिलासपुर। आखिर बिलासपुर जैसे छोटे शहर में 1985 में प्रेस क्लब का गठन कैसे हुआ यह जानना जरूरी है। उस वक्त तीन दैनिक अखबार और कुछ सप्ताहिक अखबार प्रकाशित होते थे तब बिलासपुर शहर से राज्य स्तरीय दैनिक समाचार पत्र के छापा खाने बिलासपुर में नहीं होते थे उस वक्त ऐसे पत्रकार जिन्हें साहित्य और हिंदी लेखन का गजब का ज्ञान था ने इस विचार को उस समय के एक कांग्रेसी नेता के सामने रखा की बड़े शहरों के समान बिलासपुर में भी प्रेस क्लब का गठन हो, नेताजी को बात जच गई और उन्होंने हामी भर दी समिति पंजीयन के लिए आवश्यक सदस्य भी एकत्र हो गए पर सवाल एक ही था रकम की व्यवस्था कहां से होगी तभी एक मारवाड़ी का नाम आगे आया और उन्हें उनके धन संचय प्रबंधन के कारण जोड़ लिया गया। सीधा अर्थ हुआ कि अकाउंट का खेल प्रेस क्लब की गठन के पूर्व कमजोरी है। तभी 1985 पंजीयन के बाद 1998 से कभी भी लेखा इस तरह तैयार नहीं हुआ कि निश्चित फॉर्मेट में रजिस्टार फर्म सोसाइट में पदाधिकारी चयन की सूची और लेखा निश्चित फॉर्मेट में जमा हो, जमा होना ही पर्याप्त नहीं है उसकी प्रमाणित प्रति भी मिलनी चाहिए ऐसा न करने की एक परंपरा बिलासपुर प्रेस क्लब में शुरू हो गई संस्था के अध्यक्ष क्योंकि उस वक्त प्रत्येक पद पर चुनाव नहीं होता था और अध्यक्ष ही संप्रभु होता था अन्य सब पदाधिकारी अध्यक्ष की कृपा से बनते थे अतः धीरे-धीरे यह आदत हो गई की संस्था ने स्वयं को नियमों से ऊपर मान लिया जो कि आज तक होता चला आ रहा है। प्रारंभ में आय के दो ही स्रोत होते थे प्रथम प्रेस कॉन्फ्रेंस से होने वाली निश्चित आए और दूसरा बाहरी चंदे से प्राप्त रकम जिसे कोई भी पदाधिकारी सामान्य सभा में खुलासा नहीं करता था। गठन के बाद इस वर्ष तक अध्यक्ष निर्विरोध बनते रहे किंतु 1998 आते-आते अध्यक्ष पद पर चुनाव शुरू हो गया साथ ही प्रेस जगत में दो ध्रुव बन गए एक जिसे डीपी चौबे स्मृति प्रेस ट्रस्ट कहां जाता है और दूसरा बिलासपुर प्रेस क्लब प्रेस क्लब बिलासपुर में पहला बड़ा स्कैंडल सांसद मद से प्राप्त की गई एक टाटा सफारी रहा ऐसा नहीं है कि इसके पूर्व सांसद और विधायकों से जिन काम के नाम पर निधि ली गई वही काम कराया गया हो किंतु टाटा सफारी स्कैंडल जीता जागता ऐसा मुद्दा था जिसमें सांसद निधि से ली गई टाटा सफारी जो कि एंबुलेंस के नाम पर दर्ज दिखाई देती थी । बस यही से बिलासपुर प्रेस क्लब में कटुता की राजनीति शुरू हुई जो आज तक जारी है। 
(सफारी की सवारी और जमीन में जमीर का मरना  कल सबेर )