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दावानल "सलवा जुडूम पर शोध प्रबंध"

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बिलासपुर, 1 अगस्त 2023 । द बर्निंग फॉरेस्ट इंडियास वार इन बस्तर पहले अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी 2022 में इसका हिंदी अनुवाद दावानल - माओवाद से जंग शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। भारत के लोकतांत्रिक होने के दावे और सरकारी योजनाएं बस्तर जैसे संघर्ष क्षेत्रों में पहुंचते-पहुंचते खोखले पड़ जाते हैं। बीते दो दशकों से बस्तर आज भी संघर्ष का केंद्र बना हुआ है सरकार और माओवादी के बीच के संघर्ष में आदिवासी अपनी अस्मिता, अस्तित्व और संस्कृति को बचाने के लिए लड़ रहा है। अब तो एक नया संघर्ष संस्कृति के नाम पर ईसाई विरुद्ध सनातन जाए तो कहां के समान खड़ा हो गया है कुल मिलाकर उसकी पहचान उसका आदिवासी होना उस पर अब भारी पड़ रहा है। दरअसल यह किताब दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर के विस्तृत शोध का परिणाम है जो शोध सलवा जुडूम पर कानूनी लड़ाई के बाद हुआ। संघर्ष क्षेत्र की बात जब भी होती है तो उसमें सरकार और उग्रवादियों के पक्ष रणनीति उनसे जुड़ी हिंसा की घटना का वर्णन होता है। पर जीवन शैली संस्कृति, सामाजिक और आर्थिक पहलू पर चर्चा नहीं हो पाते पर इस पुस्तक में है। किताब में संघर्ष को लेकर अदालतों, मीडिया व अन्य संवैधानिक संस्थाओं के रवैए पर काफी कुछ लिखा गया है। इस किताब को पढ़ने से यह भी पता चलता है कि आज जो कुछ मणिपुर में हो रहा है उसका कितना दंश बस्तर ने जिला है बस्तर के जंगल के अंदर कितनी बस्तियां जला दी गई, कितने ऐसे चेहरे हैं जो दूसरों के अस्तित्व को कुचलकर जलाकर बूटो तले रौंद कर आज भी कथित सभ्य समाज में निश्चिंता और मुस्कुराहट के साथ घूम रहे हैं और वोट की राजनीति में संलग्न है। पीएचडी का यह विषय 1990 में ही तय हो गया था तब के बस्तर 2005 के बस्तर और आज के बस्तर में जमीन आसमान का अंतर है। 2005 में सलवा जुडूम ने लोगों के सोचने का नजरिया बदल दिया लोकतांत्रिक संस्थाओं के रवैया भी बदल गए लगता है देश के गरीब आदिवासियों की पहुंच से बहुत कुछ बाहर जा रहा है। किताब बताती है कि 3 दशक में बस्तर कैसे बदला और कब संघर्ष का केंद्र बन गया । कई जगहों पर लगता है माओवादी और आदिवासी में अंतर कठिन है माओवाद ने तेंदूपत्ता, खनन, भूमि वितरण जैसे मुद्दों पर जमीनी पकड़ बनाई है। किताब में बताया गया है कि सलवा जुडूम कैसे एक लोकप्रिय अभियान बना पर जमीनी सच्चाई इससे हटकर थी यह एक राज्य प्रायोजित आंदोलन था। किस तरह लोगों को उनकी संस्कृति से दूर किया गया और कई को तो षडयंत्र पूर्वक स्थाई रूप से छत्तीसगढ़ के बाहर ही कर दिया गया। सलवा जुडूम का विशेष प्रभाव बीजापुर, सुकमा में था वहां के स्कूल पूरी तरीके से लंबे समय तक बंद रहे स्कूल ना जा पाना उसका प्रभाव और दर्द हम आज समझ सकते हैं जब हमारे बच्चे 1 साल तक कोविड के कारण स्कूल नहीं जा पाए। हम शहरी क्षेत्र में थे और विकल्प के तौर पर डिजिटल पढ़ाई कर ली पर सुकमा और बीजापुर में सैकड़ों परिवारों को ऐसा कुछ नसीब नहीं हुआ। सलवा जुडूम के दौरान बस्ती जलाना महिलाओं के साथ बलात्कार हिंसा हत्या की घटनाएं हुई है और किताब में यह विस्तृत रूप से दर्ज है। लड़कियों का एसपीओ द्वारा बलात्कार की कई घटनाएं हैं 2008 में एनएचआरसी जांच के लिए पहुंचा था पर गवाहियां यहां से वहां हो गई थी 2011 में बस्तर का ताड़मेटला, टइम्मआपउर, मओरपल्लइ 3 गांव जलाए गए। उच्चतम न्यायालय के संज्ञान के बाद 2012 में सीबीआई पहुंची थी। पीड़ितों को न्याय दिलाने वकील सुधा भारद्वाज ने बहुत मेहनत की पर इस सब का परिणाम उन्होंने लंबे समय तक स्वयं भोगा। आज हम सब जानते हैं कि केंद्र की सत्ता में जैसे ही भाजपा काबीज हुई उनके साथ कैसे बदले की कार्यवाही हुई सरकार का रवैया बस्तर में बलात्कार के मामलों में बहुत खराब है। आज प्रधानमंत्री 36 सेकंड के वक्तव्य में छत्तीसगढ़ के बलात्कारों का जिक्र करते हैं तब उन्हें याद करना चाहिए कि सलवा जुडूम के दौरान एसपीओ और सुरक्षा बलों द्वारा बस्तर के भीतर जो कुछ हुआ वे उसका जिक्र कर रहे हैं या किसी वर्तमान घटना का। बस्तर के आम लोग विकास चाहते हैं पर उनके विकास का अर्थ कुछ और है सरकार अपना विकास उनके विकास पर लादना चाहती है और यही से चल रहा है संघर्ष कुछ लोगों को लगता है कि उच्चतम न्यायालय में दायर जनहित याचिका समाप्त हो गई पर वे गलत हैं असल में इस जनहित याचिका के कई चरण हैं। पांचवा चरण जस्टिस निज्जर की सेवानिवृत्ति के बाद समाप्त हुआ अबमानना मामले में 2018 के बाद कोई सुनवाई नहीं हुई है सलवा जुडूम को उच्चतम न्यायालय ने गैर संवैधानिक कहते हुए खारिज कर दिया था पर उसके जख्मों पर मरहम लगाने का काम नहीं हुआ। कल जब उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता बांसुरी स्वराज ने छत्तीसगढ़ की हालत पर जो कुछ कहा वे एक बार 2005 से 2017 का छत्तीसगढ़ विशेषकर बस्तर, ताड़मेटला और प्रभावित क्षेत्र को अपना अध्ययन विषय बनाएं और फिर से इस प्रकरण को माननीय न्यायालय के सामने उठाएं शायद उन लोगों को न्याय मिल जाए जो आज भी इंतजार में हैं।