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छत्तीसगढ़ पर प्रधानमंत्री का वक्तव्य, राज्य सरकार क्यों नहीं बुला लेती विधानसभा का सत्र

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बिलासपुर, 26 जुलाई 2023। विमर्श का स्तर नाले में पहुंचे उसके पूर्व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष से करबद्ध निवेदन है कि शीघ्र ही विधानसभा का एक छोटा सत्र बुलाया जाए और 2 दिन पूर्व देश के प्रधानमंत्री ने सीढ़ी पर मणिपुर के संदर्भ में जो कथन किया जिसमें उन्होंने महिलाओं पर हिंसा के संदर्भ में जिस तरह छत्तीसगढ़ का नाम का उल्लेख किया पर खुली चर्चा हो जाए। राज्य के सभी नागरिक ऐसा चाहते हैं कि राज्य निर्माण के बाद से शहरी क्षेत्र, ग्रामीण क्षेत्र, सुदूर जंगल, धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 2001 से लेकर अब तक जहां कहीं भी जिस किसी के भी शासनकाल में महिलाओं के खिलाफ जैसी भी हिंसा हुई हो पर खुली चर्चा का समय आ गया है। इस संदर्भ में यह भी याद दिलाया जाए कि छत्तीसगढ़ में ही भारतीय जनता पार्टी शासन काल के दौरान जब विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक जी थे तो एक बंद दरवाजे का सत्र हुआ था जिसमें नक्सलवाद पर चर्चा हुई थी उस चर्चा में क्या हुआ किसने क्या कहा उसका भी अब खुलासा हो जाना चाहिए। देश की लोकसभा में भले ही सांसदों के बोलने पर माइक बंद हो जाता हो उन्हें पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया जाता हो पर अभी तक छत्तीसगढ़ की संसदीय परंपरा में ऐसी स्थिति निर्मित नहीं हुई है हम अपेक्षा रखते हैं कि नहीं होगी, पर पूरे देश के सामने प्रधानमंत्री के बयान से छत्तीसगढ़ में महिलाओं के खिलाफ हिंसा का जो आरोप लगा है उस पर स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। क्या छत्तीसगढ़ की निर्वाचित सरकार और सदन की यह जिम्मेदारी नहीं है वे प्रधानमंत्री के द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब इस तरह से दें कि संसदीय परंपरा में वह हमेशा के लिए दर्ज हो जाए।

हमें आश्चर्य लगता है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने कई सारे परिषदों का गठन किया है पर किसी भी मंच से मणिपुर की हिंसा पर कोई वक्तव्य नहीं आया जबकि 20 21 22 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर मंडला में रजा फाउंडेशन जिसके अध्यक्ष अशोक वाजपेई जी हैं का एक कार्यक्रम मंडला जिले में था समवाय शीर्षक के कार्यक्रम में 50 से अधिक लेखक शामिल थे कार्यक्रम में मणिपुर की हिंसा और स्त्रियों के साथ हो रही अमानवीयता पर चिंता जताई गई कार्यक्रम को रोककर 2 मिनट का मौन रखा गया बर्बर स्थिति पर सरकारों की उदासीनता पर चिंता जताई गई। पर छत्तीसगढ़ की सरकार जिस खुले पन के साथ सांस्कृतिक संगठनों को शोध पीठ को धन मुहैया कराती है ऐसे संगठनों ने पिछले 1 हफ के भीतर कहीं भी मणिपुर की स्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी क्या ये बुद्धिजीवी अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को भूल बैठे हैं।